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डॉ. अमीता परसुराम ‘मीता’ की शायरी में बोलते हैं जज़्बात, एहसासों को लफ़्ज़ों में पिरोकर कहती हैं- ज़िंदगी अब तुझे संवारें क्या…

‘बदल कर आइना तुम देख लो कुछ भी नहीं होगा,
कभी वाज़ेह, कभी धुंधला मगर सच फिर वही होगा।’

डॉ. अमीता परसुराम ‘मीता’

उर्दू अदब की दुनिया में कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं जो सिर्फ़ लफ़्ज़ों से नहीं, एहसास से पहचानी जाती है। ऐसी ही एक ख़ामोश मगर असरदार आवाज़ हैं डॉ. अमीता परसुराम, जिन्हें अदबी हलक़ों में उनके तख़ल्लुस ‘मीता’ से जाना जाता है। एक मनोवैज्ञानिक के तौर पर उन्होंने ज़िंदगी भर इंसानी जज़्बातों को गहराई से स्टडी की और एक शायरा के तौर पर उन्होंने इन्हीं एहसासों को लफ़्ज़ों की शक्ल दी।

शायरी जो दिल से निकलती है, दिल में उतर जाती है

मीता की शायरी में न कोई दिखावा है, न बनावट। उनके हर मिसरे में एक सच्चाई, एक एहसास और एक तजुर्बा छिपा होता है। वो अपने अशआर में ज़िंदगी की उन छोटी-छोटी बातों को बयान करती हैं जो हर किसी के दिल में कहीं न कहीं होती हैं। उनकी शायरी न सिर्फ़ मोहब्बत और जुदाई की बात करती है, बल्कि रिश्तों की पेचीदगियों, औरत की पहचान, और इंसानी जज़्बातों की गहराई को भी बख़ूबी बयां करती है।

‘ज़िंदगी अब तुझे संवारें क्या,
कोशिशें सारी बेअसर शायद।

डॉ. अमीता परसुराम ‘मीता’

इस एक शेर में ही ज़िंदगी की ठहराव और थकान दोनों नज़र आते हैं वो एहसास जो हर इंसान कभी न कभी महसूस करता है।

दाग़, साहिर, नासिर और परवीन- चार असरदार मिज़ाजों से सीखा फ़न

मीता को बचपन से ही उर्दू शायरी से गहरा लगाव रहा। उन्होंने दाग़ देहलवी की रवांदिली और बेबाकी से लेकर साहिर लुधियानवी के एहसास की गहराई, नासिर काज़मी की सादगी और परवीन शाकिर की औरत की मज़बूती।  इन सबको अपनी शायरी का हिस्सा बना लिया। शायद इसी वजह से उनके कलाम में सादगी और गहराई दोनों साथ नज़र आते हैं।

“मोहब्बत उम्र भर की राएगां करना नहीं अच्छा,
संभल ऐ दिल, अना को आसमां करना नहीं अच्छा।”

डॉ. अमीता परसुराम ‘मीता’

ये शेर साहिर की संजीदगी और परवीन की मज़बूती दोनों को एक साथ पेश करता है।

मीता की शायरी सादगी में लिपटी गहराई

मीता की ख़ासियत ये है कि वो सादा लफ़्ज़ों में गहरी बात कह देती हैं। उनकी ग़ज़लों में लय, रवानी और मौसिकी इतनी सहज है कि हर शेर एक धुन बन जाता है। शायद यही वजह है कि उनके कई ‘दर्द जब ज़ब्त की हर हद से गुज़र जाता है, ख़्वाब तन्हाई की आग़ोश में सो जाते हैं।’

ये शेर दर्द की उस हद को छूता है जहां इंसान ख़ुद अपने एहसासों का दरिया बन जाता है। मीता की शायरी का एक बड़ा पहलू ये भी है कि वो औरत के तजुर्बे और एहसास को बेहद नज़ाकत और सलीके से बयान करती हैं। वो औरत को महज़ एक किरदार नहीं, बल्कि एक सोच, एक सच्चाई और एक आवाज़ के रूप में पेश करती हैं। उनकी नज़्में और ग़ज़लें खुलकर मगर नर्मी से कहती हैं औरत प्यार करती है, तन्हा रहती है, जूझती है, मगर टूटती नहीं।

‘अधूरी वफ़ाओं से उम्मीद रखना,
हमारे भी दिल की अजब सादगी है।’

डॉ. अमीता परसुराम ‘मीता’

इस शेर में वही तन्हाई, वही भरोसा और वही औरत की ख़ामोश मज़बूती झलकती है।

पुरस्कार और पहचान

मीता की शायरी को कई बार राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला है। 

  • GIMA Awards (2011, 2012) में Best Ghazal Album और Best Lyrics श्रेणी में नामांकन।
  • Artist Aloud Awards (2016) में Best Lyrics के लिए नामांकन।
  • Cleff Music Award (2022) में Best Lyrics (Ghazal Category) से सम्मान।

ग़ज़लें जो आवाज़ बन गईं- मीता के कलाम पर अब तक 6 शानदार ग़ज़ल एलबम बन चुके हैं। 

  1. Jo Aaj Tak Na Keh Saki (2010) – पद्मश्री शांति हीरानंद और राधिका चोपड़ा की आवाज़ में।
  2. Irshaad (2011) – रेखा भारद्वाज और सुदीप बनर्जी ने गाया।
  3. Ishq Lamhe (2013) – पद्मश्री उस्ताद राशिद ख़ान और उनकी बेटी सुहा ख़ान की आवाज़ों में।
  4. Kahoon Aur Kya (2013) – उस्ताद शफ़क़त अली ख़ान (लाहौर) की आवाज़ में।
  5. Pyaar Bepanah – इस एल्बम से मीता ने युवा ग़ज़ल गायक जाज़िम शर्मा को दुनिया से मिलवाया।
  6. Afsaane – मीता की ग़ज़ल जिसे पद्मश्री हरीहरन ने गाया।

इन एलबमों ने उर्दू ग़ज़ल को एक नई पहचान दी- परंपरा और आधुनिकता के मेल के साथ। मीता की शायरी को अपनी आवाज़ देने वाले गायक किसी परिचय के मोहताज नहीं। शांति हीरानंद, उस्ताद राशिद ख़ान, हरिहरन, शफ़क़त अली ख़ान, तलत अज़ीज़, चंदन दास, रेखा भारद्वाज, टीना सानी, राधिका चोपड़ा, जाज़िम शर्मा।  इन सबकी गायकी ने उनके लफ़्ज़ों में नई जान डाली। उनके अशआर जब इन आवाज़ों से मिलते हैं, तो वो सिर्फ़ ग़ज़ल नहीं रहते, एक एहसास बन जाते हैं।

मीता- सादगी, एहसास और औरत की पहचान का संगम

मीता की शायरी हमें याद दिलाती है कि सच्चा अदब वही है जो ज़िंदगी की सच्चाई और दिल की गहराई दोनों को साथ लेकर चले। वो शायरी को सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का खेल नहीं, बल्कि ज़िंदगी का आईना मानती हैं।

‘बहुत निभाया है हमने तो ज़िंदगी तुझसे,
ज़रा मिला भी है तुझसे बहुत बक़ाया है।’

डॉ. अमीता परसुराम ‘मीता’

ये शेर जैसे उनकी अपनी ज़िंदगी की झलक है निरंतर सीखने, जीने और महसूस करने का सफ़र।

मीता की शायरी एक पुल है  दिल और दिमाग़ के दरमियान, जहां हर एहसास अपनी एक नई परत में ढल जाता है।  वो साबित करती हैं कि शायरी आज भी ज़िंदा है और वो आज भी दिलों को छूने का हुनर रखती है।

ये भी पढ़ें: शकेब जलाली: जिनकी ज़िन्दगी अधूरी ग़ज़ल थी लेकिन लफ़्ज़ एहसास बनकर उतरे 

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