27-Feb-2025
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दिल्ली में ‘वीर जी दा डेरा’ करीब 35 सालों से लोगों की कर रहा सेवा

यह संगठन दिल्ली में 25 अलग-अलग जगहों पर लंगर बांटता है

दिल्ली के दिल की धड़कन चांदनी चौक अपनी रिवायतों को निभाना बखूबी जानता है। हजारों लोगों को रोजगार देती चांदनी चौक की गलियां हमेशा गुलज़ार रहती हैं। यहां सैकड़ों इमारतें सदियों पुराना इतिहास समेटे खड़ी हैं इसके साथ ही गंगा जमुनी तहज़ीब को बयां करती हैं। यहां जैन मंदिर, जामा मस्जिद, गौरी शंकर मंदिर, है तो सेंट स्टीफन चर्च और शीश गंज गुरुद्वारा भी है।

इन सब के साथ ही यहां एक और चीज़ है जो इंसानियत, तहज़ीब और भाईचारे की मिसाल पेश करती है… वो है ‘वीर जी दा डेरा संगठन’। जिसे स्वर्गीय त्रिलोचन सिंह ने साल 1989 में शुरू किया था। आज के वक्त में उनके दोनों बेटे ब्रिगेडियर प्रेमजीत सिंह और कमलजीत सिंह इस मुहीम को आगे बढ़ा रहे हैं।

कौन थे त्रिलोचन सिंह

त्रिलोचन सिंह के बेटे कमलजीत सिंह ने DNN24 को बताया कि उनके पिता त्रिलोचन सिंह साल 1937 में म्यांमार में पैदा हुए थे। बाद में लुधियाना आए और फिर वहां से परिवार के साथ दिल्ली आकर बस गये। लुधियाना से पंजाब PWD में गए जहां उन्होंने बतौर इंजीनियर काम किया। फिर शिमला और हिमाचल में पोस्टेड हुए। 1958 में दिल्ली वापस आए और 1968 तक उन्होंने आईआईटी दिल्ली में काम किया। आईएआरआई पूसा में उन्होंने एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट में बतौर इंजीनियर काम किया। 1998 में वो रिटायर्ड हुए उसके बाद फुल टाइम अपनी लाइफ बेसहारा और जरूरतमंद लोगों की सेवा के लिए समर्पित कर दी।

झाड़ू का जत्था बनाकर की गुरुद्वारों की सफाई

त्रिलोचन सिंह ने रिटायर्ड होने का बाद गुरुद्वारे की साफ-सफाई का काम करना शुरू किया। इसके लिए उन्होंने झाड़ू का एक जत्था बनाया जिसमे बहुत सारे लोग इकट्ठा हुए। वो नियमित रूप से गुरूद्वारे में झाड़ू लगाने जाते थे। फिर लोगों को लंगर बांटते थे। अगर उन्हें कोई भी व्यक्ति घायल दिखता था तो वो तुरंत उसकी मरहम पट्टी करते थे। वो कभी भी किसी की मदद करने से पीछे नहीं हटते थे। इसी कारण, लोग उन्हें ‘वीरजी’ के नाम से बुलाने लगे और धीरे-धीरे उनके काम से जुड़ने लगे। और आज भी यह झाड़ू का जत्था काम कर रहा है। रकाबगंज गुरुद्वारा के अलावा कई ऐसी जगह है जहां ग्रुप काम करता है।

इस काम के बाद उन्होने कुछ एक्टिविटी कंस्ट्रक्शन काम शुरू किया। उन्होंने बंगला साहिब में बाथरूम ब्लॉक का कंस्ट्रक्शन करवाया। बाला साहेब में बहुत बड़ी सराय बनवाई, लंगर हॉल भी बनवाया, वहीं रकाबगंज साहिब में फर्श डालने का काम किया। वो इस तरह की एक्टिविटी में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया करते थे। धीरे-धीरे कई सारी एक्टिविटी शुरू हुई। सिर्फ सिख समुदाय ही नहीं अलग-अलग संप्रदाय के लोगों इस सेवा शामिल होते रहें।

चांदनी चौक में फ्री पट्टी सेवा

साल 2010 में उनकी मृत्यु के बाद, उनके बेटों ने इस सेवा की जिम्मेदारी ली। आज ‘वीर जी दा डेरा संगठन’ की शुरुआत अहले सुबह चांदनी चौक के शीशगंज गुरुद्वारा से होती है। जहां सुबह 7 से 8 बजे तक लोगों को फ्री मेडिकल सर्विस दी जाती है। संगठन लोगों के घाव को सालों से भरता आ रहा है। मेडिकल सेवा उन्होंने 1991 में शुरू किया। कमलजीत बताते है कि “हमने देखा कि चांदनी चौक में फुट इंजरी के केस काफी आते हैं इसलिए हमने लोगों की पट्टी करने के लिए चांदनी चौक के लोकल डॉक्टरों से लिंक किया।” जिनमें डॉ वर्मा, डॉ तलवार, डॉ ताहिर, डॉ अली उनके साथ जुड़े और करीब 25 से 30 सालों से साथ सेवा की। इसके अलावा कमलजीत ने कई अलग अलग ऑर्गनाइजेशन के साथ टाईअप किया। लोगों को कुछ दवाइयां जैसे- बुखार की दवाई, विटामिन कैप्सूल तथा मरहम-पट्टी वगैरह दिया जाता है। अगर उन्हें कहीं भी कोई बेसहारा, चोटिल या बुखार में मिलता है तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेकर उनकी मदद की जाती है।

लंगर बनाने के लिए जमीन रेंट पर लेकर करते हैं खेती

कमलजीत और प्रेमजीत लंगर बनाने के लिए 70 एकड़ ज़मीन किराए पर लेते हैं। वहां चावल, गेहूं की खेती होती है। उनकी 50 एकड़ ज़मीन अलग से है जिसमे बाजरा, चारे की फसलें उगाते है, सरसों उगाते है। उनकी गोशाला भी है जिसमे 107 जानवर हैं। ये गोशाला बूढ़े जानवरों को सपोर्ट करने के लिए बनाई गई। वहां से जो दूध आता है वो लोगों को चाय देने में इस्तेमाल होता है।

हर दिन करीब तीन से चार हजार लोगों को लंगर बांटा जाता है। कमलजीत सिंह कहते है कि “दिल्ली में दूसरे राज्यों से लोग काम की तलाश में आते हैं। उन लोगों को रहने और खाने की दिक्कत होती है। अगर आपने एक आदमी को सुबह दो रोटी खिला दी तो और उसे फस्ट एड दे दिया तो उनका काफी पैसा बच जाता है।” अगर वो खाने का पैसा बचा ले तो वो अपने घर में भेज सकते हैं।

दिल्ली में 25 अलग-अलग जगहों पर बंटता है लंगर

वीर जी दा डेरा में लोग सच्चे मन से सेवा करने आते है। इस संगठन में महिलाओं का भी योगदान काफी है। वो अपने परिवार से टाइम बचा कर यहां सेवा करने के लिए आती हैं। वीर जी दा डेरा में सात ग्रुप बनाए गए हैं। हर दिन का अलग-अलग ग्रुप है। जिससे लोगों को काम करने में परेशानी नहीं होती।

वीर जी डेरा दिल्ली में 25 अलग-अलग जगहों पर लंगर बांटता है। जिनमें आईएसबीटी के रिवर फ्रंट, चांदनी चौक, पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन बनखंडी आश्रम, रोशनआरा बाग, गुलाबी बाग वैष्णो देवी मंदिर, निज़ामुद्दीन, साई बाबा मंदिर लोधी कॉलोनी, AIIMS, बंगला साहिब गुरुद्वारा, रकाबगंज गुरुद्वारा ऐसे कई जगहों पर लंगर बांटा जाता है।

कमलजीत और प्रेमजीत सिंह लंगर बांटने के अलावा करते हैं कई सेवा

वीर जी दा डेरा लंगर बांटने के अलावा और भी कई मुहिम चलाता है । पर्यावरण को लेकर लोगों को जागरूक करना, पेड़ लगाना, गौशाला से आए दूध को स्ट्रीट डॉग को देना, बाजरे की खेती से जो उपज होती है उसे पक्षियों को देना। साथ ही जिन लोगों की बीमारी serious होती है या जिनका कोई अपना नहीं होता तो उन्हें वृद्ध आश्रम में भेज दिया जाता हैं। जहां उन्हें रहने की सुविधा के साथ-साथ सुबह दोपहर और रात का खाना दिया जाता है।

त्रिलोचन सिंह जी के सपने को उनके दोनों बेटे पूरा कर रहें। उनकी इस मुहिम से करीब 22 से ज्यादा परिवार जुड़े हुए हैं, जो सालों से सच्चे मन और पूरी श्रद्धा से ‘वीर जी दा डेरा’ में काम करने आते हैं। कमलजीत सिंह और उनके भाई ब्रिगेडियर प्रेमजीत सिंह का मानना है कि इस मुहिम की बैकबोर्न उनके volunteers हैं।

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