Cheriyal Nakashi Painting भारत की सबसे पुरानी और ख़ूबसूरत पारंपरिक कलाओं में से एक है। ये रंग-बिरंगी कला हैदराबाद की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है और पीढ़ी दर पीढ़ी कलाकार इसे संरक्षित कर रहे हैं। ये कला तेलंगाना राज्य के चेरियाल गांव से शुरू हुई थी, जो हैदराबाद से करीब 90 किलोमीटर दूर है। इस कला में सैकड़ों साल पुरानी लोक-कथाओं और धार्मिक कहानियों को रंगीन चित्रों के ज़रिए दिखाया जाता है।
विनय कुमार तेलंगाना राज्य से हैं, जो इस कला को संजोकर रखने वाले कुछ गिने-चुने कलाकारों में से एक हैं। ये कला 13वीं शताब्दी में शुरू हुई थी, जब विजयनगर साम्राज्य के दौरान कलाकार रामायण, कृष्ण लीला और शिवपुराण की कहानियों को मंदिरों की दीवारों और छतों पर चित्रित करते थे। उस समय इस कला को मंदिरों की सजावट के लिए बनाया जाता था, लेकिन बाद में इसका इस्तेमाल दूसरी जगहों पर भी होने लगा।

कलाकारों की पीढ़ियां और कला का विस्तार
विनय कुमार ने DNN24 को बताया कि उनके पूर्वज 15वीं सदी में तेलंगाना आए और इस कला को साथ लाए। पहले ये चित्र सिर्फ़ मंदिरों की दीवारों पर बनाए जाते थे, लेकिन समय के साथ कलाकारों ने इन्हें कपड़े पर बनाना शुरू किया। जब ये चित्र कपड़े पर बनाए जाने लगे, तब ये कला ज़्यादा लोगों तक पहुंच गई। ये चित्र उन लोगों के लिए बनाए जाते थे जो लोक-कथाएं सुनाते थे। वे जब कहानी सुनाते, तो साथ-साथ इन चित्रों को भी दिखाते थे, जिससे लोग कहानी को सिर्फ़ सुन ही नहीं, बल्कि देख भी पाते थे।
विरासत और पारंपरिक तकनीक
Cheriyal Nakashi Painting की परंपरा आज भी जीवित है क्योंकि कलाकार परिवारों ने इसे पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया है। विनय कुमार गर्व से अपने दादा वेंकटरमैया को याद करते हैं, जिन्होंने 19वीं सदी में इस कला को फिर से जीवित किया। उनके पिता वैकुंठम नक्श, जो राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित कलाकार थे, उन्होंने इस परंपरा को और मजबूत किया। अब विनय कुमार खुद इस कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में जुटे हैं।

इस पेंटिंग को हाथों से बनाया जाता है। कलाकार खादी का कपड़ा लेते हैं, फिर उसे इमली के बीज, चावल का मांड (स्टार्च) और पेड़ की गोंद से तैयार करते हैं। इससे कपड़ा एक ख़ास किस्म का कैनवास बन जाता है, जिस पर चित्र बनाना आसान होता है। रंग भी प्राकृतिक चीज़ों से बनाए जाते हैं। कलाकार पहले चित्र की कहानी सोचते हैं, फिर उसका स्केच बनाते हैं और फिर प्राकृतिक रंगों से उसे रंगते हैं।
आधुनिक समय में बदलाव
विनय कुमार ने लोगों की मांग के मुताबिक इस कला को नया रूप दिया है। अब ये चित्र सिर्फ़ कपड़े पर ही नहीं, बल्कि लकड़ी की थाली, मास्क, ट्रे और दीवार की सजावट के सामान पर भी बनाए जाते हैं। विनय कहते हैं कि समय बदल रहा है, तो हम कलाकारों को भी बदलना पड़ेगा। हालांकि वो ये भी कहते हैं कि पारंपरिक रंग और तकनीक को आज भी नहीं छोड़ते। Cheriyal Nakashi Painting की क़ीमत उनके आकार और मेहनत के मुताबिक होती है। इनकी शुरुआत एक हज़ार रुपये से लेकर एक लाख रुपये तक हो सकती है।

अब कलाकार सोशल मीडिया, जैसे कि इंस्टाग्राम पर Cheriyal Paintings by Vaikuntham नाम से अपने चित्रों को लोगों तक पहुंचा रहे हैं। Cheriyal Nakashi Painting सिर्फ एक चित्रकला नहीं है, बल्कि हमारी पौराणिक और सांस्कृतिक कहानियों की एक झलक है। जब हम इन कलाकारों का साथ देते हैं, तो हम भारत की सांस्कृतिक विरासत को सहेजते हैं। विनय कुमार मानते हैं कि आज भले ही जीवनशैली बदल गई हो, लेकिन वो इस परंपरा को ज़िंदा रखने के लिए पूरी तरह समर्पित हैं। जहां पहले ये चित्रकला धार्मिक कहानियों और लोक-कथाओं का ज़रिया थी, वहीं आज ये सजावट और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में भी जानी जाती है।
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