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Masrat Jan: Paper Mache की बारीकियों में छुपी कश्मीर की तहज़ीब

कश्मीर की वादियों में, जहां बर्फ के नीचे भी फूलों की ख़ुशबू सांस लेती है, वहां एक ऐसी महिला हैं जिनके रंग, ब्रश और मेहनत ने एक पूरी तहज़ीब को ज़िंदा रखा है। उनका नाम है मसरत जान। मसरत की Paper Mache कला सिर्फ़ एक डिज़ाइन नहीं, बल्कि एक गहराई, एक एहसास और एक इतिहास है, जो हर रंग में रचा-बसा है।

पुरुष-प्रधान कला में महिलाओं की दस्तक

मसरत जान ने वो कर दिखाया है जो कभी सोचा भी नहीं गया था। उन्होंने पारंपरिक कला की सीमाओं को तोड़ दिया। उस पारंपरिक कला को अपने हाथों में थामा, जो सालों से सिर्फ़ पुरुषों के लिए जानी जाती थी-पेपर मेशी (Paper Mache)। ये एक बारीक और सब्र मांगने वाली कला है, जिसमें पेपर, गोंद और रंगों के ज़रिए नायाब डिज़ाइन बनाए जाते हैं। आज उनकी मेहनत और हुनर से नए आयाम छू रही है। वो सिर्फ़ कलाकार नहीं एक विज़नरी हैं, जो 6-डायमेंशनल स्ट्रक्चर में पेपर मेशी (Paper Mache) को नई ज़िंदगी दे रही हैं।

कला नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक क्रांति

मसरत की कला सिर्फ़ दिखने में ख़ूबसूरत नहीं है, बल्कि अवॉर्ड-विनिंग भी है। उन्हें अब तक तीन बड़े पुरस्कार मिल चुके हैं। उन्होंने फ्रूट बाउल, जूलरी बॉक्स, और वॉल हैंगिंग्स जैसी चीज़ें बनाकर ये सम्मान जीते हैं। वो कहती हैं, “पेपर मेशी (Paper Mache) एक तरह से सब्र का इम्तिहान है। एक चीज़ बनाने में दो से चार महीने लगते हैं और हर दिन केवल तीन-चार घंटे ही इस पर काम हो पाता है।” उनकी यह बात इस कला की गहराई को दर्शाती है।

घर की बहू, परंपरा की वारिस

मसरत ने इस कला को अपने मामा से सीखा, जिनका पेपर मेशी (Paper Mache) का बड़ा कारखाना था। तो उनको देखकर मसरत को भी शौक़ हुआ। मसरत पेपर मेशी (Paper Mache) आर्ट बचपन से कर रही है। शादी के बाद भी यह कला उनके साथ रही, क्योंकि वो एक ऐसे घर की बहू बनीं, जो खुदपेपर मेशी (Paper Mache) का काम करता था। लेकिन मसरत ने इसे सिर्फ़ एक घरेलू कला तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने इसे अपना सपना, अपना करियर और अब दूसरों के लिए प्रेरणा बना दिया।

मसरत जब कैनवास पर रंग ब्रश के साथ बिखेरती हैं, तो वो सिर्फ़ तस्वीर नहीं बनातीं एक एहसास रचती हैं। उनके हाथों की हर हरकत में सदियों पुरानी एक विरासत सांस लेती है। ऐसा लगता है जैसे ब्रश नहीं, दिल धड़क रहा हो। जो हर लाइन में अपनी कहानी कह रहा है। वो कहती हैं कि हर आइटम पर काम करती हैं। जैसे वॉल हैंगिंग, टेबल लैंप, फूलदान, जूल बॉक्स जैसी सभी चीज़ों पर काम करती है।

कश्मीर की बेटियों के लिए एक सपना

मसरत का ख़्वाब सिर्फ़ अपनी पहचान तक नहीं रुकता। वो चाहती हैं कि कश्मीर की बेटियां भी इस फ़न से रोज़गार और इज्ज़त दोनों हासिल करें। उनका मानना है कि हर महिला को खाली नहीं बैठना चाहिए। “हर औरत और मर्द दोनों को मेहनत करनी पड़ेगी। ज़माना बदल गया है।” वो चाहती हैं कि स्कूलों में हफ़्ते में दो घंटे इस तरह की पारंपरिक कलाओं को सिखाने का समय तय किया जाए, ताकि बच्चे बचपन से ही अपने सांस्कृतिक विरासत से जुड़ सकें, चाहे वो पेपर मेशी (Paper Mache) हो, आरी वर्क, सोज़नी आर्ट या वुड कार्विंग।

मसरत दिनभर घर के कामकाज निपटाने के बाद, अपनी आर्ट पर काम करती हैं। वो कहती हैं, “घर में बैठकर पेपर मेशी (Paper Mache) आर्ट करना मुझे बहुत अच्छा लगता है। इसी की आमदनी से मेरा घर भी चलता है।” शुरुआत में मुश्किलें आईं, लेकिन मसरत ने हार नहीं मानी और आज वह खुद मिसाल बन चुकी हैं।

हर डिज़ाइन के पीछे एक जज़्बा

मसरत की कारीगरी इतनी बारीक और नफ़ीस होती है कि देखने वाला रुक जाता है। हर डिज़ाइन के पीछे एक जज़्बा होता है। जब मसरत जान अपने ब्रश से कैनवास पर रंग बिखेरती हैं, तो वो सिर्फ़ एक डिज़ाइन नहीं बनातीं, बल्कि एक एहसास रचती हैं। उनकी हर रेखा, हर रंग, हर आकृति में सदियों पुरानी कश्मीरी विरासत सांस लेती है। ऐसा लगता है जैसे उनके ब्रश नहीं, उनका दिल बोल रहा हो।

मसरत जान सिर्फ़ एक कारीगर नहीं हैं। वो एक विचार हैं और महिलाओं के लिए उम्मीद की रौशनी हैं। उन्होंने ये साबित कर दिया है कि अगर जुनून, मेहनत और हुनर हो, तो हर नामुमकिन को मुमकिन बनाया जा सकता है।

ये भी पढ़ें: नेशनल अवॉर्ड विजेता रियाज़ अहमद ख़ान की पेपर मेशी कला क्यों है ख़ास 

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