20-Apr-2024
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कठपुतली कला में जान फूंकने वाले रमेश चंद्र रावल

रमेश चंद्र रावल की कठपुतली कला (Puppetry): भारत की सभ्यता जितनी पुरानी है उतनी ही पुरानी यहां की लोक कलाएं हैं। देश की संस्कृति को अगर समझना है तो लोक कलाओं में आप इसके नज़ारे साफ देख सकते हैं। भारत के हर सूबे, हर गांव-शहर के कोने-कोने की अपनी-अपनी ख़ासियतें हैं जो उनकी लोक कलाओं में भी झलकती है। आज के फास्ट मूविंग टाइम में भारत की लोक कलाएं खत्म होने की कगार पर हैं।

लोक कलाएं देश की आज़ादी से पहले लोगों में इंकलाब जगाने और आज़ादी की मशाल जलाने के लिए खूब इस्तेमाल की जाती थीं, क्योंकि आम लोगों की लाइफ से जुड़ी हुई थीं, जिससे आज़ादी की शमा लोगों के दिलों में जलती थी। इसके साथ ही मनोरंजन के लिए लोग इस कला का आनंद लेते थे। ये कला आज के दौर में खत्म होती जा रही है, लेकिन कठपुतली आर्ट को ज़िंदा रखने की शानदार कोशिश में लगे हुए हैं रमेश चंद्र रावल, जो सत्तर साल की उम्र में भी इसमें शिद्दत से जान फूंकने का काम कर रहे हैं। अहमदाबाद के रहने वाले रमेश चंद्र रावल ने पिछले 40 सालों से कठपुतली आर्ट की रुह से खुद को जोड़ रखा हैं। 

रमेश चंद्र रावेल कठपुतली
कठपुतली आर्ट को ज़िंदा रखने की कोशिश में लगे रमेश चंद्र रावेल (Photo: DNN24)

विदेशों में किए कठपुतली शो

रमेश चंद्र ने इस मरती हुई कला को नई लाइफ दी और अब उनकी इस कला के कद्रदान भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी हैं। जापान, इटली, रोम में रमेश चंद्र को बुलावा दिया जाता है जहां पर वो अपने हुनर का जादू पूरी दुनिया के सामने पेश करते हैं। रमेश चंद्र की बातचीत जब DNN24 से हुई तब उन्होंने कठपुतली आर्ट और अपने सफर के बारें में बताया। पपट्री थिएटर के ज़रीए वो अलग-अलग मौज़ू पर शो करते हैं। उन्होंने बताया कि रामायण के साथ ही उन्होंने जापान में शकुंतला की लवस्टोरी पर भी पपर्टी शो किया था।

वह जब देश-विदेश में कठपुलियों के शो करते तो वो बस यहीं सोंचते थे कि इस लोक कला के चाहने वाले भारत में भी हों, क्योंकि जिस तरह से दूसरे देशों में बड़े-बड़े थिएटर और अकादमी हैं और इसके जरिये वो इस आर्ट को संजोने के लिए सीरियस हैं वैसा भारत में कहीं भी नहीं हैं और लोग इस कला से बेदार हैं। 

रमेश चंद्र रावेल
कठपुतली आर्ट (Photo: DNN24)

रमेश चंद्र चाहते थे कि अपने देश में भी कठपुतली आर्ट में लोगों की रग़बत जागे, इसलिए उन्होंने अपने खुद के पैसों से घर के ऊपर एक स्टूडियो तैयार करवाया। इस स्टूडियो को तैयार होने में 4 से 5 लाख रुपये खर्च हुए। इस स्टूडियो में उन्होंने एक से बढ़कर एक बेहतरीन कठपुतलियां बनाईं, जिससे आने वाली पीढ़ियों को कठपुतली कला के बारें में पता चल सके, साथ ही उनको अपने देश की शानदार और क़दीम इल्मी इतिहास के बारें में पता हो सके।  

इस कला में जान फूंकने के लिए उनसे जितना बन पड़ता है वो करते हैं, लेकिन कठपुतली कला में और ज़्यादा अच्छा हो सकता है। “मैं जब भी बड़े-बड़े लोगों से मिलता हूं तो उनसे इस कला के लिए मदद की दरकार बताता हूं। वो उस वक्त तो कठपुतली कला के बारें में लंबी-लंबी तारीफें तो करते हैं लेकिन बाद में उनका कोई जवाब नहीं आता। मैं चाहता हूं कि भारत सरकार इस कला पर थोड़ा ध्यान दे और इसको आगे बढ़ाने के लिए कुछ करे।”  

रमेश आगे कहते हैं कि आप अपने आस-पास जो कठपुतली का डांस देखते हैं वो सिर्फ कठपुतली की एक किस्म है। वो बताते हैं कि कठपुतली कई तरह की होती है जैसे धागा कठपुतली, छाया कठपुतली, दास्ताना कठपुतली, छड़ कठपुतली वगैरहा। 

पारिवारिक जीवन

70 साल के रमेश चंद्र की पैदाइश गुजरात के सौराष्ट्र में हुई, लेकिन अब वो अहमदाबाद में रहते हैं। उनकी तालीम गांव के कस्तूरबा गांधी स्कूल से 11वीं क्लास तक हुई क्योंकि घर के माली हालात अच्छे नही थे, जिसकी वजह से वो आगे की पढ़ाई नहीं कर सके। रमेश का मन शरूआती वक्त से कठपुतली बनाने में रमा था। रमेश रावल ने शादी नहीं की। उन्होंने कहा कि उन्होंने कठपुतली कला से ही शादी कर ली है और वो इस हुनर को खत्म होते नहीं देखना चाहते। 

कठपुतली कलाकार रमेश चंद्र रावेल
कठपुतली कलाकार रमेश चंद्र रावेल (Photo: DNN24)

रमेश ने DNN24 को बताया कि “उनकी आमदनी बहुत ख़ास नहीं है, लेकिन वो कठपुतली कला को मरते हुए नहीं देख सकते, इसलिए थोड़े पैसों में भी उन्होंने इस काम को जारी रखा। रमेश कहते हैं कि उन्हें खाने-पीने से ज्यादा अपनी कठपुतली कला की ज्यादा फिक्र है। वो चाहते हैं कि इस आर्ट को आगे बढ़ाने के लिए उनके साथ कोई खड़ा हो और इसको देश-दुनिया में आगे बढ़ाने का काम कर सके।  

शैक्षणिक संस्थान में देते हैं वर्कशॉप

रमेश चंद्र गुजरात यूनिवर्सिटी में पपट्री की वर्कशॉप स्टूडेंट्स को देते हैं। रमेश दिल्ली के प्रगति मैदान में भी कठपुतली के कई शो कर चुके हैं। वो बच्चों को हाथों से कठपुतली बनाने का तरीके समझाते हैं। साथ ही वो इस बात पर फोकस करना सिखाते हैं कि स्टोरी में कैरेक्टर के मुताबिक कठपुतली की मूवमेंट और डायलॉग कैसे सेट होते हैं। जिन लोगों को कठपुतली आर्ट के बारें में पता नहीं होता हैं और जब वो उनका शो देखते हैं तो खुश होते हैं लेकिन जब कठपुतली खरीदने की बात आती है तो वो लोग बिना खरीदे ही आगे बढ़ जाते हैं।   

रमेश कहते हैं कि कठपुतली उनकी जिंदगी है और वो इस कला को देश के हर कोने में फैलाना चाहते हैं, जिससे लोग इस कला के बारें में जाने। वो इस कला को मरता हुआ नहीं देखना चाहते। उनकी ख़्वाहिश हैं कि इस नायाब और ग़ायब होती कला को आने वाली पीढ़ी जान सके और देश की धरोहर की तरह ही बचाने का काम कर सके।  

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