22-Apr-2024
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ज़रदोज़ी को 3D आर्ट में बदलने वाला Legendary कारीगर,जिसने बनाई मोज़ेज़ की तस्वीर

शेख शम्सुद्दीन साहब ने अमेरिका के वाइट हाउस में ज़रदोज़ी आर्ट के कई शो किए

हुनर की रंगत, हाथों का करिश्मा और मेहनत का पसीना, इन तीनों की चमक नज़र आती है इस खास एंब्रॉयडरी में, जिसको ज़रदोज़ी के नाम से जाना जाता है। मुगल काल से लेकर लखनऊ के नवाबों तक की पोशाकों का हिस्सा रह चुका ज़रदोज़ी का काम, आज फैशन के गलियारों में अपना अलग मुकाम रखता है। सोने और चांदी के तारों से की जाने वाली ज़रदोज़ी की कढ़ाई अब चमकते धागों से की जाती है। ये कढ़ाई रेशम, साटन या किसी मखमली कपड़े पर उकेरी जाती है। ज़रदोज़ी पर्शियन कल्चर का हैंडीक्राफ्ट है, जो बादशाह अकबर के शासनकाल के दौरान काफी फेमस हुई।

मुगलों की राजधानी रह चुके आगरा शहर में ज़रदोज़ी के लीजेंडरी रहे शेख शमसुद्दीन साहब, जो हैंड एंब्रॉयडरी में बहुत बड़ा नाम है जिन्होंने ज़रदोज़ी का एक खास प्रोजेक्ट तैयार करते हुए अपनी आंखों की रोशनी गंवा दी थी। भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री अवॉर्ड से नावाजा था। शमसुद्दीन साहब को अमेरिका के राष्ट्रपति ने लिंडन बेन्स जॉनसन और जेराल्ड फोर्ड ने वाइट हाउस में शो के लिए इंवाइट भी किया था। आज उनकी विरासत और इस ख़ूबसूरत कढ़ाई को ज़िंदा रखे हुए है उनकी नई पीढ़ी। शम्सुद्दीन साहब के पोते फ़ैज़ान उद्दीन से DNN24 ने खास बातचीत की। 

क्या है ज़रदोज़ी वर्क और इसका इतिहास 

ज़रदोज़ी फारसी भाषा का शब्द है ज़र के मायने होते है ‘सोना’ और दोज़ी का मतलब होता है ‘काम करना’ है, जो कढ़ाई सोने से की जाती थी उसे ज़रदोज़ी कहा जाता था। सोने की कढ़ाई उपमहाद्वीप में ऋग्वेद के समय से, 1500 से 1200 ईसा पूर्व के बीच अस्तित्व में है। ये 17 वीं शताब्दी में मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान समृद्ध हुई। ख़ासतौर पर नूरजहां के दौर में इसे काफी पहचान मिली। आज ये भारतीय शहरों लखनऊ, हैदराबाद, फर्रुखाबाद, चेन्नई और भोपाल में लोकप्रिय है साथ ही पाकिस्तान, ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान देखने को मिलती है। अब बनारसी साड़ी में भी ज़रदोज़ी का काम देखने को मिलता है। 2013 में लखनऊ ज़रदोज़ी को जीआईआर ने GI टैग प्रदान किया था। 

कैसे सोने से हटकर चमकीले धागों पर आई ये कढ़ाई 

फैज़ान ने DNN24 को बताया कि वक्त के साथ साथ राजघराने और नवाबीयत खत्म हो गई इसलिए ये काम सोने से हटकर चांदी पर आ गया। आज महंगाई होने की वजह से लोग ज़रदोज़ी कढ़ाई को खरीद नहीं पाते हैं। यही वजह रही कि सोने से हटकर ये कढ़ाई चांदी पर आई और आज चमकीले धागों से की जाती है। उन्होंने बताया कि ज़रदोज़ी के काम के अलग अलग सेंटर हैं, जहां से इसका कच्चा माल आता है। सूरत से ज़री, बॉम्बे से सिल्क, दिल्ली से वेलवेट्स, जयपुर से जवाहरात आता है। इसी तरह इसे खरीदने वाले सारे कस्टमर्स हिंदुस्तान के नहीं बल्कि विदेशों से भी है, जिनमे अमेरिका और यूरोप शामिल है। अब इंडिया के अंदर भी इस कढ़ाई की बहुत बड़ी मार्केट डेवलप हो रही है जो फैज़ान का सारा माल खरीद रहें हैं।  

ज़रदोज़ी के प्रोजेक्ट को बनाते हुए गई आंखों की रौशनी 

शेख शमसुद्दीन साहब 3D Embroidery का आविष्कार करने वाले ऐसे शख़्स थे जिन्होंने अपनी सारी ज़िंदगी इस कढ़ाई को दे दी। शम्स साहब ने एक प्रोजेक्ट बनाया जिसका नाम था ‘मोज़ेज़ ऑन द माउंट ऑफ गॉड’। उन्होंने इस प्रोजेक्ट में प्रोफिट मोज़िज़ की तस्वीर बनाई थी, जिसे बनाने में उन्हें 14 साल लगे। लेकिन उन्हें इस बात की ख़बर नहीं थी कि वो प्रोजेक्ट उनकी ज़िंदगी का आखिरी प्रोजेक्ट बन जाएगा।

प्रोजेक्ट की कामयाबी ये रही कि अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड विलसन रीगन ने फेस्टिवल ऑफ इंडिया ऑर्गनाइज करवाया और उस तस्वीर को इस फेस्टिवल में सजाया गया। फेस्टिवल ऑफ इंडिया खत्म होने के बाद भी तस्वीर को ढाई सालों तक अमेरिका में रखा गया।

फैज़ान ने DNN24 को बताया कि ‘फेस्टिवल ऑफ इंडिया’ शो के दौरान शम्स साहब अमेरिका में ही थे। एक रात उनकी आंख से रेटिना अलग हो गया। उन्होंने मेरे पिता को फोन किया और कहा, रईस मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा है, मेरे पिता ने मेरे ग्रैंड फादर से कहा कि ये आमतौर पर होता है कि आंखे चिपक जाती है आप अपनी आंखों को पानी से धो लीजिए ठीक हो जाएगा। लेकिन उन्होंने कहा कि मेरी आखों में रौशनी नहीं है। ये सुनकर वो हैरान हो गए।

उस समय फैज़ान के पिता ने अमेरिकी एंबेसी से कॉन्टेक्ट करके अमेरिका जाने का प्लान बनाया। शिकागो के सबसे अच्छे डॉक्टर से शम्स साहब का इलाज करवाया। जब उनकी सर्जरी हुई तो वो सफल नहीं हो सकी। डॉक्टर ने करीब एक महीने के बाद दोबारा सर्जरी की। कई कोशिशों के बाद उनकी आंखों की रोशनी वापस नहीं आ सकी।

इस दौरान डॉक्टर ने फैज़ान के पिता रईस साहब से शम्स साहब के काम के बारे में पूछा। रईस साहब ने बताया कि वो आर्टिस्ट है और करीब 12 से 15 घंटे काम करते हैं। डॉक्टर ने कहा कि क्या इन्होंने हाल में कोई ऐसा काम किया है जिसमे उन्हें ज्यादा आंखों का ज़ोर लगाना पड़ा हो। रईस साहब ने डॉक्टर को बताया कि इन्होंने फिलहाल मोज़िज़ की तस्वीर बनाई थी। जिसे बनाने के लिए उन्होंने 18 से 20 घंटे काम किया। उस वक्त डॉक्टर ने कहा कि इनकी आंखों की रोशनी कभी वापस नहीं आएगी मैं जितनी कोशिश कर सकता था.. कर चुका हूं।

पंडित जवाहर लाल नेहरू का आर्टिस्ट के साथ ख़ास रिश्ता 

फ़ैज़ान ने बताया कि शम्स साहब के दौर में जितने भी आर्टिस्ट रहें उन्हें फेमस पंडित जवाहर लाल नेहरू ने किया। भारत की आज़ादी के बाद यूरोप और अमेरिका के गेस्ट का काफी आना जाना रहता था। जब भी बाहर से कोई गेस्ट आते तो उन्हें नेहरू अपने अलग अंदाज़ से मिलवाते थे। वो कहते थे ‘Meet my artist. you have Michelangelo in Europe and we have shams in Asia.’ एक दिन शम्स साहब ने जवाहर लाल से कहा कि आप गेस्ट के सामने मेरी और माइकल एंजेलो की बराबरी कर देते हैं, मैं खुद उन्हें अपना गुरू मानता हूं। ऐसा आप क्यों करते है? नेहरू मुस्कुराए और कहा कि तुम मेरी नज़रों में माइकल से भी ऊपर हो। नेहरू का मानना था कि माइकल के काम करने की एक सीमा थी लेकिन तुम्हारी कोई सीमा नहीं है।  

अमेरिका के वाइट हाउस में किए शो 

साल 1966 में शम्सुद्दीन साहब का काम देखने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन बेन्स जॉनसन ने उन्हें इनवाइट किया। ये उनका अमेरिका में पहला शो था। उसके बाद 1976 में अमेरिकी राष्ट्रपति जेराल्ड फोर्ड ने बुलाया और वाइट हाउस में उनका दोबारा शो हुआ। शम्स साहब ने जेराल्ड फोर्ड से कहा कि मेरी ख्वाहिश है कि मैं आपको भी एंब्रॉयडरी में बनाऊं। फोर्ड ने इसकी उन्हें इजाज़त दी। साल 1990 में वो तस्वीर बनकर तैयार हुई और 1993 में शम्स साहब तस्वीर लेकर अमेरिका पहुंचे। तस्वीर देखते ही उन्होंने मुझे गले लगाया और फोटो खींचने के लिए कहा। फैज़ान बताते है कि मेरे फादर से प्रेसिडेंट फोर्ड ने कहा कि आपके पिता ने मुझे इतना खूबसूरत बनाया जितना मैं दिखता नहीं हूं। उन्होंने कहा मैंने अपनी ज़िंदगी में इतनी खूबसूरत आर्ट कभी नहीं देखी।  

फैज़ान ने DNN24 को बताया कि मलेशिया के प्रधानमंत्री महाथिर बिन मोहम्मद को मलेशिया का फाउंडर कहा जाता है। मेरे ग्रैंड फादर ने उन्हें एक मोर की तस्वीर गिफ्ट की थी। वो काम को देखकर इतने खुश हुए कि उन्होंने मलेशिया की यूनिवर्सिटी में इस आर्ट को इंट्रोड्यूस करने को कहा था।”

शम्स साहब के बेहतरीन काम के लिए उन्हें कई अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। डॉ ज़ाकिर हुसैन ने शम्स साहब को स्पेशल अवॉर्ड, इंदिरा गांधी ने नेशनल अवॉर्ड, मुलायम सिंह यादव ने यशभारती पुरस्कार, रामस्वामी वेंकटरमण ने पद्म श्री अवॉर्ड से नवाज़ा।

फ्रांस के एम्ब्रॉयडरी शो में गेस्ट ऑफ ऑनर

फैज़ानउद्दीन ने एम. कॉम के साथ फ्रैंच लैंग्विंज में मास्टर्स किया है, साथ ही अलग अलग यूनिवर्सिटी में लैक्चर दिए हैं। ज़रदोज़ी का काम उन्होंने अपने ग्रैंड फादर और अपने पिता रईस उद्दीन साहब से सीखा। हर साल फ्रांस में फेस्टिवल ऑफ नीडल्स नाम से एक प्रोग्राम किया जाता है। इस शो में दुनियाभर के कलाकारों को बुलाया जाता है। इस प्रोग्राम में फैज़ान अद्दीन को साल 2015 में गेस्ट ऑफ ऑनर बनाया था। 

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और रानी राधिका राजे को दी तस्वीर 

फैज़ान के पास एक संस्था आई जो झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को कुछ गिफ्ट करना चाहते थे। फैज़ान ने संस्था को हेमंत सोरेन की एक पोट्रेट बनाकर गिफ्ट की। हेमेंत सोरेन ने जब वो तस्वीर देखी तो उन्होंने कम से कम एक घंटा उस तस्वीर पर बात की। उन्होंने कहा कि इस कला को उत्तर प्रदेश के अलावा झारखंड में भी काम शुरू किया जाना चाहिए।

हिंदुस्तान की मशहूर बड़ौदा रॉयल फैमिली की रानी राधिका राजे ने फैज़ान के काम और उनके परिवार के बारे में काफी सुना हुआ था। राधिका राजे ने फैज़ान को अपने पैलेस में इन्वाइट किया। आज वो उनके कुछ प्रोजक्ट के साथ काम कर रहें हैं। फ़ैज़ान का मानना है कि “आर्ट ही आपका कल्चर बताता है, मैं बहुत खुश हूं कि आज भी हिंदुस्तान में कई लोग है जो ये मानते है कि अगर आर्टिसंस खत्म हो जाएंगे तो हिंदुस्तान का एक कल्चर खत्म हो जाएगा। हिंदुस्तान एक ऐसा गुलदस्ता है जहां पर हर तरह के फूल है और एक ही गुलदस्ते में बंधे हुए है।  हमारे इस काम में हर धर्म के लोग जुड़े हुए है।”

जब DNN24 की टीम फ़ैज़ान के घर पहुंची तो 3D एम्ब्रॉडरी में टाइगर बना देखा। टाइगर में ख़ास बात थी कि अगर हम रेशम के धागे को अलग करे तो उसमे से तीन लेयर बाहर आती है उसकी एक सिंगल लेयर से टाइगर को बनाया गया। स्टिच ऑन स्टिच करके इसे 3D effect दिया जाता है अगर हम इसे कहीं भी घुमाएंगे तो ये टाइगर आपको फॉलो करेगा।  

क्या खत्म हो जाएगी ये कारीगरी 

ज़रदोज़ी अपने आप में एक बहुत महंगी कारीगरी है। लेकिन आज इस काम को कोई करना नहीं चाहता। वजह है कि बारीक और मेहनत ज्यादा होने के बावजूद मज़दूरों को उतनी रकम नहीं दी जाती जितनी उन्हें मिलनी चाहिए है। आज लोग अपने बच्चों को इस एरिया में नहीं आने देना चाहते है। यहां काम करने वाले कारीगर शफीक ख़ान बताते है कि वो करीब 40 सालों से इस काम से जुड़े हुए है। उनका मानना है कि इस काम में सबसे ज्यादा दिक्कत आंखों की होती है हर छह महीने के अंदर उन्हें आंखों का टेस्ट कराना होता है।  

फ़ैज़ान उत्तर प्रदेश सरकार के साथ और उनकी योगदान से कई स्कीम पर काम कर रहें है। जिसमे वो स्टूडेंट्स को इस काम की ट्रेनिंग देंगे। फ़ैज़ान एम्ब्रॉयडरी वर्क की हर साल ट्रेनिंग देते है यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, मिडिल ईस्ट से लोग आते है और काम सीखते है। हर साल वो खुद यूरोप जाकर लोगों को ट्रेनिंग देते हैं।

ये भी पढ़ें: पेपर मेसी आर्ट को 3D रूप देने वाले शब्बीर अहमद

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