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अंजुम बाराबंकवी की श्रीराम पर ग़ज़ल को पीएम मोदी ने पत्र लिखकर सराहा

अगर आप सोचते हैं कि ग़ज़ल का दायरा सिर्फ़ मोहब्बत और जुदाई तक सीमित है, तो भोपाल के मशहूर शायर अंजुम बाराबंकवी (Anjum Barabankvi) की रचनाएं आपकी सोच बदल सकती हैं। उनकी एक ग़ज़ल, जो उन्होंने भगवान राम पर लिखी थी, ने न सिर्फ़ साहित्य जगत में सराहना पाई, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पत्र लिखकर उनकी तारीफ़ की।

कौन हैं अंजुम बाराबंकवी ?

डॉ. अंजुम बाराबंकवी (Anjum Barabankvi) का असल नाम सैयद क़लीम कर्रार है। उनकी मां ने प्यार से उन्हें अंजुम नाम दिया, और बाद में उन्होंने अपने शहर का नाम जोड़कर अंजुम बाराबंकवी (Anjum Barabankvi) बना लिया। उन्होंने मशहूर शायर बशीर बद्र पर PhD की है। इसके साथ ही एतबार, दिल का गुलाब जैसी कई किताबें लिखी हैं। उनकी लेखनी किसी धर्म या सरहद में क़ैद नहीं, बल्कि इंसानियत का पैग़ाम देती है। उनकी शायरी का जादू सिर्फ़ साहित्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बॉलीवुड सुपरस्टार शाहरुख़ ख़ान ने भी X (ट्विटर) पर उनके शेर को शेयर किया।

राम पर ग़ज़ल लिखने का ख़्याल कैसे आया?

अंजुम बाराबंकवी (Anjum Barabankvi) ने DNN24 को बताया कि राम पर ग़ज़ल लिखने की उनकी कोई पहले की प्लानिंग नहीं थी। जब राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हुई, तो उनके मुस्लिम कवि मित्रों ने भोपाल में एक आयोजन किया, जिसमें सभी ने भगवान राम पर शायरी पढ़ी। इस आयोजन ने समाज में एकता और सौहार्द का संदेश दिया। तभी उन्होंने सोचा कि भगवान राम की महिमा में कुछ शेर लिखने चाहिए।

ग़ज़ल के फॉर्मेट में लिखने की वजह बताते हुए उन्होंने कहा कि कई मुस्लिम राइटर्स ने भगवान कृष्ण पर लिखा है, मगर ज़्यादातर ने इसे नज़्म या गीत के रूप में पेश किया। ग़ज़ल के रूप में बहुत कम लिखा गया है। 43 से 44 साल की अपनी लेखन यात्रा में उन्होंने ग़ज़ल में लिखा है इसलिए उन्होंने ग़ज़ल के अंदाज़ में राम पर लिखने का फ़ैसला किया।

डॉ. अंजुम की राम पर ग़ज़ल

दूर लगते हैं मगर पास हैं दशरथ नंदन

मेरी हर सांस का विश्वास हैं दशरथ नंदन

दूसरे लोगों के बारे में नहीं जानता हूं

मेरे जीवन में बहुत ख़ास हैं दशरथ नंदन

दिल के काग़ज़ पर कई बार लिखा मैंने

एक महकता हुआ एहसास हैं दशरथ नंदन

पीएम मोदी की प्रतिक्रिया

प्रधानमंत्री मोदी की प्रतिक्रिया को लेकर अंजुम बाराबंकवी (Anjum Barabankvi) ने बताया कि जब उन्होंने ग़ज़ल प्रधानमंत्री को भेजी, तो मोदीजी ने उन्हें पत्र लिखकर सराहा। “मेरे लिए ये बहुत बड़ा सम्मान है कि भारत के प्रधानमंत्री ने मेरी शायरी की तारीफ़ की। लेकिन सबसे ख़ास बात पत्र के आख़िर में लिखे गए तीन शब्द थे-‘आपका नरेंद्र मोदी’। ये मेरे लिए किसी इनाम से कम नहीं है।” इतने बड़े मुल्क़ के प्रधानमंत्री ने एक छोटे कलमकार की किसी चीज़ को सराहा ये बहुत बड़ी बात है।

डॉ. अंजुम की रचनाओं में दीपावली और सरस्वती वंदना

अंजुम बाराबंकवी (Anjum Barabankvi) ने दीपावली पर एक विशेष रचना लिखी, जिसमें भगवान राम की अयोध्या वापसी के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्त्व को दर्शाया गया है। उनके मुताबिक, “दीपावली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भगवान राम के अयोध्या लौटने का जश्न है, जिसे हर वर्ष हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।”

इसके अलावा, वर्ष 2014 में प्रकाशित एक पुस्तक में उन्होंने सरस्वती वंदना भी लिखी। उनकी इस वंदना का एक सुंदर शेर है:
“पुत्रों पर कीजिए अपनी कृपा वीणा वादरी,
चल जाए रस की ठंडी हवा।”

अंजुम बाराबंकवी (Anjum Barabankvi) का मानना है कि साहित्य और भक्ति का आपसी संबंध अटूट है। वे कहते हैं, “हमें किसी भी महान हस्ती या ईश्वरीय शक्ति के सम्मान में ग़ज़ल या कविता लिखने में कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। ये हमारी सांस्कृतिक और साहित्यिक परंपरा का हिस्सा है।”

बचपन से रामायण तक का सफ़र

अंजुम बाराबंकवी (Anjum Barabankvi) ने बताया कि उनके गांव में जब रामलीला होती थी, तो उनके माता-पिता ने कभी उन पर कोई पाबंदी नहीं लगाई। शाम 4 बजे से 8 बजे तक वे रामलीला देखने जाते थे। मां हमारे साथ एक अंकल को भेजती थी जो हमारा ध्यान रखते थे। जब रामायण सीरियल आया, तब घर में उसे देखा गया। वे कहते हैं, “यही असली हिंदुस्तान है, जहां संस्कृति और धर्म की सीमाएं मोहब्बत के आगे फीकी पड़ जाती हैं।”

विदेशों में भारतीय शायरी का परचम

अंजुम बाराबंकवी (Anjum Barabankvi) ने विदेशों में भी अपनी शायरी का जादू बिखेरा है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग का अनुभव अलग होता है। उन्होंने अमेरिका, दुबई, लंदन जैसे देशों में मुशायरों में हिस्सा लिया। उन्होंने बताया कि बाहर हमारा एक्सपीरियंस अच्छा ही रहता है, शायरी सुनने वाले लोग होते हैं बहुत सराहना करते हैं। उन्होंने कहा, “भारतीय शायरी की जो मिठास है, वह कहीं और नहीं मिलती। जहां भी भारतीय मिलते हैं, वहां एक छोटा-सा हिंदुस्तान बस जाता है।”

शाहरुख़ ख़ान ने शेयर किया अंजुम का शेर

डॉ. अंजुम की शायरी ने बॉलीवुड के किंग शाहरुख़ ख़ान को भी प्रभावित किया। शाहरुख़ ने X (ट्विटर) पर उनका शेर शेयर किया-

“मुझे सोने की क़ीमत मत बताओ
मैं मिट्टी हूं, मेरी अज़मत बहुत है।”

अंजुम ने बताया कि उनके बेटे ने जब यह पोस्ट देखी, तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ। किसी बड़े शख्स का आपकी शायरी को एक्नॉलेज करना ही सबसे बड़ी बात होती है।

बशीर बद्र पर PhD और उनकी ख़ासियत

डॉ. अंजुम ने अपनी PhD मशहूर शायर बशीर बद्र पर की है। उनका मानना है कि बशीर बद्र पहले ऐसे शायर थे जिन्होंने अंग्रेज़ी शब्दों को ग़ज़ल में शामिल किया। हम जो हिंदी उर्दू बोलने वाले लोग हैं वो शब्द को बनाते हैं और उसमें अर्थ पैदा कर देते हैं मतलब निकाल देते हैं उसमें क्या उस शब्द की रूह क्या है? उन्होंने कहा, “बशीर बद्र का शेर देखिए-

“ज़ाफ़रानी पुलओवर उसी का हिस्सा है
कोई जो दूसरा पहने तो दूसरा ही लगे”

इससे पहले किसी शायर ने ‘ज़ाफ़रानी पुलओवर’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया था। यही उनकी खासियत थी।” अब शेर ये है कि उनका कि जो हवा चली तो लचक गई” अब इसमें कंटेंट के अलावा आपको एक कानों में जैसे रस घुल रहा घुल रहा हो इस तरह

“तुझे भूल जाने की कोशिशें कभी कामयाब न हो

सकीं तिरी याद शाख़-ए-गुलाब है जो हवा चली तो लचक गई”

“नारियल के दरख़्तों की पागल हवा खुल गए बादबाँ लौट जा लौट जा

सांवली सरज़मीं पर मैं अगले बरस फूल खिलने से पहले ही आ जाऊँगा”

अब ये जो पोएट्री है ये उनसे पहले इस तरह की पोएट्री नहीं लिखी गई। वो पहले ऐसे शायर है जो अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में एमए के स्टूडेंट हैं और सिलेबस में शामिल है। सात नए कवि शामिल हुए थे सिलेबस में उसमें एक बशीर बद्र साहब भी थे। वो खुद एमए के स्टूडेंट थे और अपनी शायरी खुद उनको पढ़नी पड़े तो। कैसे नज़ारा होगा। ऐसी बहुत सारी चीजें है जो जिसकी वजह से मैंने काम किया और बहुत सारी उनमें उनके कलाम में उनकी शायरी में खूबियां हैं।

डीडी उर्दू में किया काम

डॉ. अंजुम ने डीडी उर्दू के ‘महफ़िल-ए-निशात’ प्रोग्राम के लिए स्क्रिप्ट लिखी और गीत भी लिखे। ये कार्यक्रम भारत के प्रख्यात और उभरते हुए शायरों पर केंद्रित था, जिसमें मुनव्वर राना, राहत इंदौरी, मंज़र भोपाली, ज़िया फारूकी समेत कुल 13 शायर शामिल थे।

कार्यक्रम की सबसे ख़ास बात ये थी कि इसमें शायर अपना कलाम प्रस्तुत करते, जिसे बाद में प्रसिद्ध गायकों द्वारा गाया जाता। इसके साथ ही, वहां मौजूद पत्रकार शायरों से सवाल-जवाब करते, जिससे कार्यक्रम और भी रोचक बनता। लगभग 40 मिनट के इस अनोखे कार्यक्रम में एक जीवंत महफ़िल का माहौल तैयार किया गया था। डॉ. अंजुम का योगदान केवल स्क्रिप्ट तक सीमित नहीं था, बल्कि कार्यक्रम का टाइटल सॉन्ग भी उन्हीं का लिखा हुआ था। कार्यक्रम का अंतिम एपिसोड खुद डॉ. अंजुम पर फोकस था।

सम्मान और किताबें

डॉ. अंजुम को जबलपुर (म.प्र.) में ‘अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान’, अभिनव कला परिषद, भोपाल द्वारा ‘तुलसी सम्मान 2011’, और म.प्र. तुलसी साहित्य अकादमी, भोपाल सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। अपने सम्मान पर उन्होंने विनम्रता से कहा, “मुझे कभी उम्मीद नहीं थी कि मुझे इतने पुरस्कारों से नवाज़ा जाएगा। हर सम्मान अपने आप में बड़ा होता है, कोई भी छोटा नहीं होता। ये पूरी तरह नज़रिए पर निर्भर करता है कि आप उसे कैसे स्वीकार करते हैं और कितना महत्व देते हैं। मुझे कई जगहों पर सम्मानित किया गया है। ये सब ऊपर वाले की मेहरबानी है और आप सभी की दुआओं का नतीजा है।

उन्होंने साहित्य जगत में अपनी गहरी छाप छोड़ी है। वे ‘ऐतबार’, ‘ग़ज़ल यूनिवर्स’, ‘दिल का गुलाब’, ‘डॉ. बशीर बद्र की शायरी’, ‘सौग़ात’ और ‘ज़माना कुछ और है’ जैसी कई चर्चित पुस्तकों के लेखक हैं। उनकी रचनाएं साहित्य प्रेमियों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं और उर्दू शायरी को एक नई ऊंचाई तक पहुंचाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

भविष्य की योजना

अंजुम बाराबंकवी (Anjum Barabankvi) ने बताया कि वे राम के विषय में और ग़ज़लें लिखने का काम कर रहे हैं। उनकी प्लानिंग है कि अक्टूबर 2025 तक 51 ग़ज़लों का एक स्पेशल कलेक्शन तैयार कर उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेंट करें। इस संकलन के महत्व को समझाते हुए उन्होंने कहा, “ये केवल शायरी का संग्रह नहीं होगा, बल्कि इसमें गहरे भाव और विचारों की चित्रात्मक अभिव्यक्ति होगी। इस काम के लिए एकाग्रता की ज़रूरत है, जिसके चलते अन्य लेखन कार्य फिलहाल स्थगित हैं।”

अंजुम बाराबंकवी (Anjum Barabankvi) का उद्देश्य एक ऐसा साहित्यिक दस्तावेज तैयार करना है, जो आने वाले पचास सालो तक भी प्रासंगिक बना रहे। वे कहते हैं, “हम इस संकलन को किसी एक दृष्टिकोण या धार्मिक सीमाओं में बांधकर नहीं देखना चाहते। इसे इस तरह रचा जा रहा है कि भविष्य में, जब कोई इसे पढ़े, तो वह निष्पक्ष रूप से इसका आनंद ले सके और इसकी गहराई को समझ सके। हमारा प्रयास है कि इसमें ऐसा कुछ न हो, जिस पर कोई उंगली रख सके या इसे किसी एक विचारधारा तक सीमित किया जा सके।”

ये भी पढ़ें: शेख तालिब हुसैन रिंद: कश्मीर भद्रवाह के मशहूर कवि और लेखक

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