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Muharram पर सरसों का ताज़िया: सांभर लेक की मोहब्बत और मज़हब का संगम

राजस्थान के सांभर लेक कस्बे में हर साल Muharram के मौके़ पर एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जो पूरे देश में एक मिसाल बन चुकी है। ये परंपरा है, सरसों का ताज़िया निकालने की, जो हिंदू-मुस्लिम एकता और गंगा-जमुनी तहज़ीब का एक जीती जागती मिसाल है। जयपुर से लगभग 80 किलोमीटर दूर बसे इस कस्बे में, जब Muharram आता है, तो लोग मिलकर ताज़िया बनाते हैं। लेकिन ये ताज़िया आम ताज़ियों से अलग होता है, इसमें सरसों के दाने उगाए जाते हैं, जो भाईचारे, श्रद्धा और समर्पण की जड़ें और भी मज़बूत कर देते हैं।

गोयल परिवार कई पीढ़ियो से निभाता आ रहा परंपरा

द्वारका प्रसाद गोयल बताते हैं कि उनके दादा और पिता भी Muharram पर इस सरसों के ताज़िये को निकालते थे। 30 सालों से वो खुद इस परंपरा को निभा रहे हैं। उनका मानना है कि उनके परिवार की कोई मुराद इस ताज़िए के ज़रिए पूरी हुई थी, तभी से उनके घर में इस काम को सेवा और सौभाग्य माना जाता है।

पहले द्वारका प्रसाद गोयल के पिताजी और बाबूं लाल बंजारा साथ में मिलकर ताज़िया बनाते थे। गोयल परिवार के साथ बंजारा समुदाय के लोग भी मिलकर ताज़िया बनाते हैं — सलामुद्दीन बंजारा, मुंशी बंजारा जैसे लोग इस काम में सालों से सहयोग कर रहे हैं। यह ताज़िया “बंजारों की मस्जिद” से निकलता है, और इसलिए इसे “बंजारों का ताज़िया” कहा जाता है।

जब ताज़िया बनता है मुरादों का दरवाज़ा

ताज़िया बनाते समय, कई लोग मन्नतें मांगते हैं ,कोई संतान की इच्छा रखता है, कोई स्वास्थ्य के लिए दुआ करता है। पैसे उछाले जाते हैं और उन्हे बाद में बच्चों के गलों में पहनाएं जाते हैं। ऐसा विश्वास है कि ताज़िये के नीचे से निकलने से मुरादें पूरी होती हैं। लोग अपनी भावनाओं के साथ ताज़िए के नीचे से निकलते हैं, और आपसी दुआओं से माहौल भर जाता है। गोयल परिवार का मानना है कि सरसों के ताज़िए से फसल का अंदाज़ा भी लगाया जाता है। अगर सरसों अच्छे से उगती है, तो माना जाता है कि उस साल फसल अच्छी होगी। यह कृषि से जुड़ी आस्था को भी दर्शाता है।

सरसों का ताज़िया – एक अनूठी रचना

Muharram से कुछ समय पहले ताज़िए बनाने की शुरुआत होती है एक लकड़ी के फ्रेम से। इस फ्रेम पर कपड़ा चढ़ाया जाता है, फिर उस पर रूई लगाई जाती है। इसके बाद उस पर सरसों के दाने लगाए जाते हैं। समय-समय पर पानी दिया जाता है, और 7 से 8 दिन में सरसों अंकुरित हो जाती है। ताज़िया हर दिन एक नया रूप लेता है, जैसे-जैसे सरसों उगती है, उसकी हरियाली श्रद्धा की तस्वीर बन जाती है। ताज़िया का नीचे का हिस्सा बन जाने के बाद ऊपर की गुम्मद बनाई जाती है और बाद में फिर चांदी का कलश लगाया जाता है।

फिर ताज़िया जुलूस के लिए तैयार हो जाता है। यह जुलूस शनिश्चरजी मंदिर, पुराना पोस्ट ऑफिस, नकासा चौक होते हुए कर्बला तक पहुँचता है। रास्ते में हर धर्म के लोग इसमें शामिल होते हैं। बच्चे, महिलाएं, बुज़ुर्ग, सब ताज़िए के साथ चलते हैं। नकासा चौक पर ताज़िया करीब एक घंटे तक रुकता है, लोग दर्शन करते हैं, श्रद्धा से नीचे से निकलते हैं, और फिर यह ताज़िया कर्बला में दफनाया जाता है।

बच्चों के लिए टॉफियां और ‘सापा’ की परंपरा

ताज़िए के दिन बच्चों को टॉफियां बांटी जाती हैं। यह ताज़िए का ‘प्रसाद’ माना जाता है। ताज़िया बनाने वाले कारीगरों को ‘सापा’ (पगड़ी का कपड़ा) दिया जाता है। एक तरह का तोहफ़ा, जो सम्मान का प्रतीक होता है। एक बिस्ती भी होता है, जो दिन-रात ताज़िए को पानी देता है। दुनिया में Muharram के मौक़े पर यह ताज़िया सिर्फ़ सांभर लेक में बनता है, इसलिए इसे पूरी दुनिया में एक यूनिक परंपरा मानी जाती है। यह ताज़िया सिर्फ एक धार्मिक प्रतीक नहीं है, बल्कि यह सांप्रदायिक सौहार्द, लोक आस्था और सामाजिक एकता का एक ख़ूबसूरत उदाहरण है।

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