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पानी बचाने की मुहिम से बने राम बाबू तिवारी “वाटर हीरो”

बुंदेलखंड के बांदा ज़िले में रहने वाले राम बाबू तिवारी ने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन देश के प्रधानमंत्री उनका नाम ‘मन की बात’ कार्यक्रम में लेगें। राम बाबू तिवारी की कहानी एक ऐसे इंसान की है जिसने अपने क्षेत्र में पानी के बचाव के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। आज लोग उन्हे ‘वाटर हीरो’ के नाम से बुलाते हैं। 

महज़ 17 साल की उम्र में उन्होंने जल संरक्षण मिशन की नींव डाली और तब से लगातार इस मिशन पर काम कर रहे हैं। उनके प्रयासों ने न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। जिसका नतीजा है कि प्रधानमंत्री मोदी ने ‘मन की बात’ रेडियो कार्यक्रम में उनका ज़िक्र किया। DNN24 ने राम बाबू तिवारी से उनके शानदार कामों, उनकी ज़िंदगी, जल संरक्षण के महत्व और कम्युनिटी के प्रयासों के बारे में बातचीत की। चलिए जानते हैं उनके इस मिशन और फ्यूचर को लेकर उनके काम और सोच के बारे में-  

राम बाबू तिवारी कैसे आपने 17 साल की उम्र में ही जल संरक्षण का काम शुरू किया, इसके पीछे की प्रेरणा क्या थी?

जल संरक्षण की प्रेरणा अपने गांव और आस-पास के क्षेत्रों में जल संकट की समस्या से मिली। वो याद करते हैं कि कैसे उनकी मां और गांव की दूसरी  महिलाएं रोज़ सुबह कुएं से पानी भरकर लाने के लिए लंबी दूरी तय करती थीं। इस अनुभव ने उन्हें जल संरक्षण के महत्व को समझने में मदद की। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए, जब उन्होंने देखा कि लोग नहाने के लिए बहुत सारा पानी बर्बाद कर रहे हैं, तो उन्हें लगा कि अगर थोड़ा ध्यान दिया जाए, तो ये पानी बचाया जा सकता है। ये सभी अनुभवों ने जल संरक्षण के लिए प्रेरित किया।

तालाब की सफाई करते हुए रामबाबू तिवारी (फोटो: राम बाबू तिवारी)

बुंदेलखंड में पानी की समस्या कितनी गंभीर है और इसकी सबसे बड़ी वजह क्या हैं?

बुंदेलखंड क्षेत्र में पानी की समस्या काफी गंभीर है। ये एरिया प्राकृतिक रूप से पानी की कमी वाला नहीं है, बल्कि यहां पानी के प्रबंधन की समस्या है। मौसमी असंतुलन, जल प्रबंधन की कमी, पारंपरिक जल संरक्षण विधियों का त्याग, ज़मीन इस्तेमाल के तरीकों में बदलाव, अवैध खनन, बढ़ती जनसंख्या और शहरीकरण, अतिक्रमण, जल साक्षरता की कमी और जलवायु परिवर्तन जैसे कारण इस समस्या को और बढ़ा रहे हैं। ये कारण न केवल पीने के पानी की कमी पैदा कर रहे हैं, बल्कि कृषि और पशुपालन जैसी आजीविका के प्रमुख स्रोतों को भी प्रभावित कर रहे हैं। इसका नतीजा ये रहा कि यहां गरीबी और पलायन जैसी समस्याएं भी बढ़ती जा रही हैं।

 जल संरक्षण के प्रयास

राम बाबू तिवारी ने अपने गांव और आस-पास के इलाकों में जल संरक्षण के लिए कई प्रयास किए हैं। उन्होंने अपने दोस्तों और सहपाठियों के साथ मिलकर ‘पानी चौपाल’ का आयोजन शुरू किया। जहां वे लोगों को जल संरक्षण के महत्व के बारे में जागरूक करते थे। शुरुआत में लोगों ने उनका मज़ाक उड़ाया, लेकिन धीरे-धीरे कुछ लोग उनके साथ आए और उन्होंने शपथ ली कि वे पानी की बर्बादी को रोकेंगे। ये छोटी सी शुरुआत आगे चलकर एक बड़े अभियान में तब्दील हो गई। आज राम बाबू तिवारी को ‘वाटर हीरो’ के नाम से जाना जाता है।  

तालाब की सफाई करते हुए (फोटो: राम बाबू तिवारी)

सवाल- ‘पानी चौपाल’ और ‘पानी पंचायत’ कार्यक्रमों के बारे में बताइए।

पानी चौपाल और पानी पंचायत हमारे जल संरक्षण अभियान के दो अहम  स्तंभ हैं। ये कार्यक्रम समुदाय को एकजुट करने और जल संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने में प्रभावी साबित हुए हैं। पानी चौपाल एक ऐसा मंच है, जहां हम गांव के लोगों को एकत्र करते हैं और पानी से जुड़ी समस्याओं पर खुलकर चर्चा करते हैं। ये एक प्राचीन भारतीय परंपरा ‘चौपाल’ का आधुनिक रूपांतरण है, जहां लोग अपने विचारों और चिंताओं को आपस में बताते हैं।  पानी चौपाल में हम जल संकट, जल संरक्षण के तरीके, और स्थानीय जल स्रोतों के प्रबंधन जैसे विषयों पर बात करते हैं। ये एक ऐसा मंच है जहां हर किसी की आवाज़ सुनी जाती है। चाहे वो किसान हो, महिला हो, या युवा।

पानी पंचायत इस चर्चा को एक कदम आगे ले जाती है। ये एक संगठित समिति है जो गांव के जल संसाधनों के प्रबंधन और संरक्षण के लिए योजनाएं बनाती है और उन्हें लागू करती है। पानी पंचायत में चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं जो गांव के अलग-अलग वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वो तालाबों की सफाई, बारिश के पानी को बचाना और पानी के उचित इस्तेमाल जैसे मुद्दों पर फैसले लेते हैं।

पानी पंचायत (फोटो: राम बाबू तिवारी)

तालाबों का पुनरुद्धार: गांवों में नई जान

गांवों में तालाबों के पुनरुद्धार से जिंदगी में रंग भर गया है। पानी की किल्लत खत्म हुई है और लोगों को राहत मिली। एक महिला ने बताया कि पहले सुबह-सुबह पानी लेने जाना पड़ता था, अब ये टेंशन नहीं रही। बच्चे टाइम से स्कूल जा पाते हैं और हम अपने काम पर ध्यान दे पाते हैं।

खेती-बाड़ी में भी तरक्की हुई है। किसान अब साल में दो-तीन फसलें उगा पा रहे हैं। एक किसान ने बताया कि इससे उनकी आमदनी दोगुनी हो गई है। गांव का माहौल भी बदला है। जहां पहले सूखी जमीन थी, वहां अब हरियाली छा गई है। जानवर और परिंदे भी वापस आ गए हैं।

समाज में भी बदलाव आया है। लोग मिलजुल कर काम करते हैं। तालाब से नए रोजगार भी पैदा हुए हैं। कुछ लोग मछली पाल रहे हैं, तो कुछ सैर-सपाटे से जुड़े काम कर रहे हैं। सबसे अहम बात ये है कि लोगों में आत्मविश्वास जगा है। वो अब अपनी मुश्किलों का हल खुद ढूंढ सकते हैं।

जल चौपाल (फोटो: राम बाबू तिवारी)

जलमित्र: पानी के सच्चे दोस्त

 हम बात करेंगे “जल मित्र” की। ये वो लोग हैं जो पानी बचाने की मुहिम में दिल-ओ-जान से जुटे हैं। जल मित्र क्या करते हैं? वो गांव-गांव जाकर लोगों को समझाते हैं कि पानी कितना कीमती है। वो तालाबों की देखभाल करते हैं और अगर कहीं पानी की दिक्कत हो तो उसे दूर करने में मदद करते हैं।

जल मित्र सिर्फ बातें नहीं करते, काम भी करते हैं। वो तय करते हैं कि तालाब में मछली कैसे पाली जाए या खेतों में पानी कैसे दिया जाए। वो एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं और अपने तजुर्बे बांटते हैं। अभी करीब 52 सौ जल मित्र हैं। अब इनकी तादाद बढ़ती जा रही है। जल मित्र बनना कोई मुश्किल काम नहीं है। अगर आप पानी के लिए कुछ करना चाहते हैं, पानी चौपाल में हिस्सा लेते हैं या श्रमदान करते हैं, तो आप भी जल मित्र बन सकते हैं।

प्रधानमंत्री की ‘मन की बात’ से मिली नई उड़ान

जब प्रधानमंत्री जी ने ‘मन की बात’ में हमारे काम का जिक्र किया, तो हमारी मेहनत को एक नई पहचान मिली। पहले हम लोगों के पास जाकर अपने काम के बारे में बताते थे, लेकिन अब लोग खुद हमें बुलाते हैं। ये बदलाव बहुत अहम है क्योंकि इससे हमारी बात ज्यादा लोगों तक पहुंच रही है।

अब लोग हमें जानते हैं और हमारे काम की इज्जत करते हैं। इससे हमें और जोश के साथ काम करने की हिम्मत मिलती है। ये हमें सिखाता है कि जब आप अच्छे काम के लिए दिल से मेहनत करते हैं, तो दुनिया उसे पहचानती है। हमारा ये छोटा सा काम अब एक बड़ी मुहिम बन गया है। लोग जुड़ रहे हैं और पानी बचाने की अहमियत को समझ रहे हैं। ये अब सिर्फ हमारा नहीं, पूरे देश का मिशन बन गया है।

गांव का पानी गांव में, खेत का पानी खेत में

ये हमारा मूल मंत्र है। इसके लिए हम कई काम करते हैं जो न सिर्फ पानी बचाते हैं, बल्कि लोगों को भी ताकतवर बनाते हैं।

सबसे पहले, हम बारिश के पानी को जमीन में समाने की कोशिश करते हैं। हर बूंद कीमती है, और हमारा मकसद है कि ज्यादा से ज्यादा पानी धरती में जाए। इसके लिए हम खेतों में मेड़बंदी करते हैं। ये एक सादा लेकिन कारगर तरीका है जो पानी को खेत में ही रोक लेता है। इससे मिट्टी गीली रहती है और जमीन के अंदर पानी बढ़ता है।

श्रमदान (फोटो: राम बाबू तिवारी)

दूसरा बड़ा काम है तालाबों की मरम्मत और नए तालाब बनाना। हर गांव में औसतन छह से आठ तालाब होते हैं। हम इन तालाबों की सफाई करते हैं, उन्हें गहरा करते हैं, और उनके आसपास पेड़ लगाते हैं। इससे न सिर्फ पानी रुकता है, बल्कि जानवर-पक्षियों को भी घर मिलता है।

हम छोटे-छोटे पानी रोकने के ढांचे भी बनाते हैं, जैसे कि रिचार्ज ट्रेंच और चेक डैम। ये पानी को धीरे-धीरे जमीन में जाने देते हैं, जिससे जमीन के अंदर पानी बढ़ता है। गांव के लोगों को समझाना और जागरूक करना भी इस काम का एक अहम हिस्सा है। हम उन्हें बताते हैं कि पानी कैसे बचाएं और कैसे इस्तेमाल करें।

पानी बचाओ, जिंदगी बचाओ

नौजवानों से मेरी गुज़ारिश है – “पानी ही जिंदगी है, इसे संभालो, इसे बचाओ।” ये सिर्फ एक नारा नहीं है, ये जीने का तरीका है जो हमारी जिंदगी के लिए बहुत जरूरी है।

सबसे पहले, मैं नौजवानों से कहूंगा कि वो अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में पानी की अहमियत को समझें। हर बूंद कीमती है। नल बंद करना, कम पानी से नहाना, या बर्तन धोते वक्त पानी बचाना, ये छोटे-छोटे काम बड़ा फर्क ला सकते हैं।

दूसरा, मैं उन्हें कहूंगा कि वो अपने आसपास के पानी के स्रोतों के बारे में जानें। अपने गांव या शहर के तालाबों, नदियों, या झीलों की हालत को समझें। इससे उन्हें पता चलेगा कि असल में पानी की क्या स्थिति है।

तीसरा, मैं उन्हें ‘जल मित्र’ बनने के लिए कहूंगा। वो अपने इलाके में पानी बचाने के लिए आगे आ सकते हैं। वो स्कूलों में प्रोग्राम कर सकते हैं, सोशल मीडिया पर जानकारी बांट सकते हैं, या पानी बचाने के काम में वॉलंटियर बन सकते हैं।

चौथा, मैं उन्हें नए आइडिया सोचने के लिए कहूंगा। नौजवानों के पास नई सोच और नए विचार होते हैं। वो पानी बचाने के लिए नई तकनीक ईजाद कर सकते हैं, या पुराने तरीकों को नए अंदाज में इस्तेमाल कर सकते हैं।

जल बचाव के लिए संकल्प लेते हुए (फोटो: राम बाबू तिवारी)

पांचवां, मैं उन्हें कहूंगा कि वो पानी बचाने को अपने करियर से जोड़ें। पानी की देखभाल, पर्यावरण की पढ़ाई, या टिकाऊ विकास जैसे क्षेत्रों में मौके ढूंढें। इस तरह वो अपने जुनून को अपने काम में बदल सकते हैं।

छठा, मैं उन्हें याद दिलाऊंगा कि पानी बचाना सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं है। ये इंसाफ का भी सवाल है। पानी की कमी अक्सर गरीबों को सबसे ज्यादा परेशान करती है। पानी बचाने के लिए काम करके, वो एक बेहतर समाज बनाने में मदद कर रहे हैं।

आखिर में, मैं उन्हें याद दिलाऊंगा कि प्रकृति के साथ तालमेल में रहना हमारी संस्कृति का हिस्सा है। हमारे बुजुर्गों ने हमें पानी की इज्जत करना सिखाया है। इस ज्ञान को आगे बढ़ाना हमारी जिम्मेदारी है।

नौजवानों को ये समझना चाहिए कि वो बदलाव की ताकत हैं। उनके पास जोश है, उत्साह है, और नए विचार हैं। जब वो पानी बचाने के लिए खड़े होंगे, तो वो न सिर्फ पर्यावरण की रक्षा करेंगे, बल्कि एक बेहतर, टिकाऊ कल का निर्माण करेंगे। याद रखें, हर बूंद मायने रखती हैं, और हर छोटा काम बड़ा बदलाव ला सकता है।

इस तरह, पानी बचाने की मुहिम सिर्फ एक काम नहीं है, ये एक लाइफ स्टाइल है। ये हमें सिखाती है कि कैसे प्रकृति के साथ तालमेल में रहा जाए, कैसे समाज को बेहतर बनाया जाए, और कैसे हर एक व्यक्ति बदलाव ला सकता है। आइए, हम सब मिलकर इस मुहिम को आगे बढ़ाएं और एक ऐसी दुनिया बनाएं जहां हर बूंद की कदर हो और हर जीवन को पानी मिले।

ये भी पढ़ें: क्रिकेट का ‘काबुलीवाला’- अब्दुल अज़ीज़ की दिलचस्प कहानी

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3 COMMENTS

  1. Rambabu, great work done, kudos to your passion, consistency ,optimism and patience. Recently our interaction at Udaipur in Jal conference has impacted me to a great extent. Definitely our Bharat will progress due to unending efforts to people like you. 🙏🙏🙏

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