Friday, February 13, 2026
15.1 C
Delhi

असम के शास्त्रीय ‘सत्रिया नृत्य’ को देश-विदेश तक पहुंचाने वाले रामकृष्णा और रूमी तालुकदार

संगीत नाटक अकादमी द्वारा मान्यता प्राप्त भारत के 8 शास्त्रीय नृत्य में से एक है सत्रिया नृत्य जो उत्तरपूर्व राज्य असम की पहचान है। सत्रिया नृत्य को इस बुलंदी तक पहुंचाने के लिए जिन कलाकारों और गुरुओं ने बेइंतिहा मेहनत की है उनमें एक नाम है रामकृष्णा तालुकदार का जो एक सत्रिया नर्तक और गुरु भी हैं। रामकृष्ण जी देश-विदेश में सैकड़ों कार्यक्रम कर चुके हैं और सैकड़ों बच्चों को सत्रिया नृत्य सिखा भी रहे हैं। उनके इस काम में उनका साथ देती हैं उनकी पत्नी रूमी तालुकदार। वो भी एक सत्रिया नर्तकी हैं, और देश-विदेश में अपना कार्यक्रम प्रस्तुत कर चुकी हैं।

कब शुरू हुई सत्रिया नृत्य शैली

सत्रिया नृत्य शैली उत्तरपूर्वी राज्य असम से जुड़ी है। 15वीं सदी में असम के महान वैष्‍णव संत और सुधारक श्रीमंत शंकरदेव ने सत्रिया नृत्‍य को वैष्‍णव धर्म के प्रचार के माध्‍यम के रूप में शुरू किया था। बाद में ये नृत्‍य शैली एक विशिष्‍ट नृत्‍य शैली के रूप में विकसित हुई। रामकृष्ण तालुकदार एक प्रसिद्ध सत्रिया नर्तक हैं जिन्होंने इस नृत्य शैली के विकास और प्रचार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इस नृत्य की विशेषता, नर्तकी का सुंदर और जटिल फुट वर्क और चेहरे के हाव भाव हैं जो हिंदू पौराणिक कथाओं और भगवान कृष्ण के जीवन की कहानियों को दर्शाते हैं।

रामकृष्णा कहते हैं कि सत्रिया नृत्य द्वारा आत्मा और परमात्मा का मिलन होता है। इसलिए सत्रिया नृत्य प्रस्तुत करने वाले हर नर्तक को आत्मा की गहराइयों में उतर जाना चाहिए, तब ही वो इस नृत्य को समझ सकता है। रामकृष्णा ने DNN24 को बताया कि “पहले आत्मा से इस डांस से जुड़ना चाहिए। नहीं जुड़ने से इस का परम तत्व नहीं मिलेगा क्योंकि महापुरुष श्रीमान शंकरदेव का ये डांस आत्मा और परमात्मा का जो मिलन होता है उस से बनाया जाता है। यह डांस आसान भी नहीं है। ये आध्यात्मिक डांस है। कोई मॉडर्न डांस से संपर्क नहीं है।”

रामकृष्ण तालुकदार का सत्रिया नृत्य तक का सफ़र

असम के बारपेटा ज़िले की पाठशाला में 1963 में जन्मे रामकृष्णा तालुकदार ने बचपन से ही सत्रिया नृत्य की शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी। शायद यही कारण है कि बचपन से ही कला के प्रति समर्पण और निष्ठा ने एक नर्तक को आज के समय के सबसे उच्च कोटि के ‘कलाकार’ में बदल दिया है। रामकृष्णा की महत्वपूर्ण उपलब्धियों और सत्रिया नृत्य के लिए उनके योगदान की एक लंबी सूची है। रामकृष्ण तालुकदार असम के पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने दूरदर्शन दिल्ली से सत्रिया नृत्य में ‘ए’ ग्रेड की मान्यता प्राप्त की है। वो सत्रिया नृत्य में प्रथम श्रेणी की डिग्री प्राप्त करने वाले भी पहले व्यक्ति हैं।

सिर्फ़ इतना ही नहीं, उन्होंने गंधर्व महाविद्यालय, इंदौर से कथक में भी एम.एम. यू.एस किया है। उनकी पुस्तक “नृत्य कला दर्पण” को SEBA बोर्ड ने अपने HSLC पाठ्यक्रम की पाठ्यपुस्तक के रूप में स्वीकार किया है। वो सत्रिया नृत्य में ICCR, एकल और समूह श्रेणी के एक सूचीबद्ध कलाकार भी हैं। सत्रिया नृत्य के क्षेत्र में उनके आजीवन योगदान के लिए उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2017 से भी सम्मानित किया गया है। रामकृष्णा तालुकदार संगीत और नृत्य दोनों में अपनी अभिनव रचना के साथ पूरे देश में दर्शकों को आकर्षित करने में हमेशा सफ़ल रहे हैं। सिर्फ़ इतना ही नहीं, रामकृष्णा विदेशों में भी दर्जनों कार्यक्रम प्रस्तुत कर चुके हैं।

सत्रिया नृत्य को देश-विदेश तक पहुंचाने की ज़िम्मेदारी

असम के नृत्य जगत के जाने माने गुरुजन और कलाकार जब 1980 और 90 के दशक में सत्रिया नृत्य को शास्त्रीय संगीत का दर्जा दिलाने का प्रयास कर रहे थे तब रामकृष्णा को उनके गुरुओं ने सब से महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी सौंपी और कथक नृत्य भी सीखने को कहा ताकि ये मालूम हो सके की सत्रिया नृत्य में कहीं कोई कमी तो नहीं।

रामकृष्णा ने अपने गुरुओं की आज्ञा का पालन करते हुए लखनऊ से विशारद मुंबई में डिप्लोमा, उसके बाद एमपी से कथक नृत्य में मास्टर की डिग्री हासिल की। आखिरकर सबकी मेहनत रंग लायी और 2000 में असम के सत्रिया नृत्य को शास्त्रीय संगीत के रूप में मान्यता मिल गयी। उसके बाद रामकृष्णा की ज़िम्मेदारी और बढ़ गई। अब सत्रिया नृत्य को देश-विदेश के कोने-कोने तक पहुंचाना और लोकप्रिय बनाना था लिहाजा रामकृष्ण ने अपना पूरा समय सत्रिया नृत्य को देने का मन बना लिया।

रामकृष्णा तालुकदार ने DNN24 को बताया कि सरकार ने उन्हे सम्मान भी दिया, बाहर जितना भी इंडियन क्लासिकल डांस फेस्टिवल होता है उन सभी में उन्हे परफ़ोर्मेंस करने के लिए सरकार ने भेजा। करीब दिल्ली में उन्होने 56 परफ़ॉर्मेंस दिए हैं। इसके अलावा पूरे भारत में, विदेश में जैसे स्कॉटलैंड, एडेनबर्ग यूनिवर्सिटी, लंदन, दुबई और कुवैत में भी परफ़ॉर्म किया है।

37 साल पुराना ‘रामकृष्णा नर्तन कला निकेतन स्कूल’

पिछले 37 साल से रामकृष्णा ‘नर्तन कला निकेतन’ नाम का अपना एक स्कूल भी चलाते हैं। रामकृष्णा ने DNN24 को बताया कि “हमारा सत्रीया डांस साल 2000 में क्लासिकल हो गया। जब उन्हें क्लासिकल का सम्मान मिल गया तो मैंने फूल टाइम सत्रीया डांस को दिया है। उस समय में मेरा सरकारी कॉलेज में नौकरी भी थी और हमारा स्कूल भी था। 1987 में यह नर्तन कला निकेतन शुरू हुआ। और इसे अब तक 37 साल पूरे हो गए।”

स्कूल में करीब तीन सौ बच्चे नृत्य सीखने आते हैं। हर साल कुछ बच्चे नृत्य की शिक्षा ले कर जाते हैं और कुछ नए दाखिला ले लेते हैं। कुछ बच्चे तो पांच साल की उम्र से ही यहां नृत्य सीख रहे हैं। बच्चे मानते हैं कि ये उनका सौभाग्य है कि वो रामकृष्णा जैसे गुरु से सत्रिया नृत्य की शिक्षा ले रहे हैं। उन्हें इस बात से सबसे ज़्यादा खुशी होती है कि उनके गुरु जी उन्हें नृत्य सिखाते हुए कई कार्यक्रमों में उन्हें स्टेज पर प्रस्तुती करने का मौका भी देते हैं। बच्चों की ख़्वाहिश भी यही है कि वो सत्रिया नृत्य को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दें।

ज़रूरी बात ये है कि अभिभावक अपने बच्चों को सिर्फ शौक के लिए नृत्य सीखने के लिए नहीं भेजते हैं बल्कि वो मानते हैं कि सत्रिया नृत्य असमिया संस्कृति की पहचान है, जिसे बुलंदी तक ले जाना और विश्व के कोने-कोने तक पहुंचाना हर असमिया की ज़िम्मेदारी बनती है।

सत्रिया नृत्य सिर्फ़ लड़के ही किया करते थे

एक समय था जब सत्रिया नृत्य सिर्फ़ युवक ही किया करते थे, लेकिन आज के समय में ज्यादातर युवतियां सीख रही हैं। एक बार जिसने सत्रिया नृत्य सीखना शुरू कर दिया तो फिर सत्रिया नृत्य उस के रगरग में बस जाता है। इसका जीता जागता उदाहरण हैं मिताली और मोलिका। दोनों गुवाहाटी से 300 किलोमीटर दूर जोरहाट की रहने वाली हैं और इस वक़्त गुवाहाटी में रामकृष्णा जी द्वारा चलाए जा रहे सत्रिया नृत्य वर्कशाप में नृत्य सीख रही हैं।

दोनों महिलाओं की कहानी बड़ी ही दिलचस्प हैं। दोनों ने बचपन में सत्रिया नृत्य सीखा लेकिन शादी होने के बाद घर गृहस्थी में इतना व्यस्त हो गयीं कि नृत्य को आगे बढ़ाने का मौका ही नहीं मिलता था। अब जब बच्चे थोड़े बड़े हो गए तो दोनों के अंदर खामोश बैठे सत्रिया नृत्य ने एक बार फिर करवट ली और रामकृष्णा जी से नृत्य सीखने की अपने बचपन की ख्वाहिश लिए गुवाहाटी पहुंच गयीं। अब वो चाहती हैं कि वर्कशॉप से वापस लौट कर जोरहट में एक नृत्य स्कूल खोलें और अपने इलाके में भी सत्रिया नृत्य को आगे बढ़ाएं ।

रूमी तालुकदार बचपन से ही सत्रिया नृत्य कर रही है

रूमी तालुकदार गुरु रामकृष्ण जी की पत्नी है। रूमी का जन्म स्थान बारपेटा है। रूमी ने बहुत ही कम उम्र से नृत्य करना शुरू कर दिया था। वो सिर्फ़ 12 साल की थी जब उन्होंने अपना पहला सत्रिया एकल प्रदर्शन किया था। एक स्वाभाविक कलाकार रूमी, शुरू में अपने पिता से प्रेरित थीं, जो नृत्य और नाटक से जुड़े थे। बाद में वो गुरु रामकृष्णा तालुकदार से नृत्य सीखने लगीं। गुरु शिष्य परंपरा के तहत गुरु रामकृष्णा तालुकदार से सत्रिया नृत्य सीखने वाली रूमी एक निपुण सत्रिया नृत्यांगना हैं। 1987 में एक नाटक में गुरु रामकृष्णा ने राम का किरदार और रूमी ने सीता का किरदार निभाया जिसे बहुत पसंद किया गया। उसके बाद ही दोनों ने विवाह कर कर लिया।

रूमी तालुकदार सत्रिया नृत्य के लिए दूरदर्शन केंद्र नई दिल्ली द्वारा ‘ए’ ग्रेड मान्यता प्राप्त है। उन्होंने अलग-अलग टेलीफिल्मों, टीवी धारावाहिकों में भी अभिनय किया। वो सत्रिया नृत्य में आईसीसीआर (एकल) की एक सूचीबद्ध कलाकार हैं। उन्होंने 1994 में बीएसवी, लखनऊ के तहत कथक में अपना नृत्य विशारद पूरा किया है और वो सत्रिया संगीत शिक्षक समाज, असम की सदस्य भी हैं। रूमी मानती हैं कि यंग जनरेशन में सत्रिया नृत्य प्रसिद्ध हो रहा है।

आज रामकृष्णा तालुकदार और रूमी तालुकदार, अब दोनों कलाकार गुरु और गुरु मां बन कर बच्चों को सत्रिया नृत्य की शिक्षा दे रहे हैं। और नई पीढ़ी में सत्रिया नृत्य को आगे बढ़ाने की सोच के साथ आगे बढ़ रहे हैं।

ये भी पढ़ें: प्लास्टिक से नाव बनाकर की 530 किमी यात्रा, असम के धीरज बिकास गोगोई चला रहे मुहिम

आप हमें FacebookInstagramTwitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

Agha Shah Dargah Holds Something Modern Life Has Almost Forgotten

Agha Shah Dargah sits beside the old waters of...

How K-Pop Culture Transforms Young Indian Lives

K-Pop has moved far beyond catchy hooks and polished...

Maha Shivratri Vigils: How Fasting Devotees Practice Selflessness

When darkness blankets the earth on Phalgun's moonless night,...

India-Canada Ties Move Towards a Thaw

With the change of government in Ottawa in March...

One Rupee Philosophy:Transforming Lives Through Education

A simple idea born from tragedy became a lifeline...

Topics

Agha Shah Dargah Holds Something Modern Life Has Almost Forgotten

Agha Shah Dargah sits beside the old waters of...

How K-Pop Culture Transforms Young Indian Lives

K-Pop has moved far beyond catchy hooks and polished...

Maha Shivratri Vigils: How Fasting Devotees Practice Selflessness

When darkness blankets the earth on Phalgun's moonless night,...

India-Canada Ties Move Towards a Thaw

With the change of government in Ottawa in March...

One Rupee Philosophy:Transforming Lives Through Education

A simple idea born from tragedy became a lifeline...

M Kothiyavi Rahi: Progressive Urdu Poet’s Enduring Legacy

A young boy in Azamgarh, eastern Uttar Pradesh, watched...

Lais Quraishi Quietly Rewrote Pain Into Poetry

He was born Abulais Quraishi on 6 May 1922...

Hazrat Sufi Inayat Khan Dargah: A Sacred Space 

Under the soft, uneven light of Nizamuddin Basti, there...

Related Articles