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हैदर अली आतिश: लखनऊ की नफ़ासत और दिल्ली की रिवायत का वो शायर जिसने इश्क़ को नई ज़ुबान दी

उर्दू शायरी की दुनिया में कुछ नाम ऐसे हैं जिनका ज़िक्र आते ही एक ख़ास नूर, एक ख़ास रूहानी ख़ुशबू फ़िज़ा में घुल जाती है। ख़्वाजा हैदर अली ‘आतिश’ भी उन्हीं नामों में से एक हैं लखनऊ की नाज़ुक़-तरीन तहज़ीब और दिल्ली की गहरी, अंदरूनी शायरी के बीच खड़े हुए वो शायर, जिनकी ज़बान में सादगी भी थी, तड़प भी थी और ऐसी दिलकश रवानी भी जो आज तक दिलों को भिगो देती है।

“ये आरज़ू थी तुझे गुल के रू-ब-रू करते
हम और बुलबुल-ए-बेताब गुफ़्तुगू करते”

हैदर अली आतिश

इस एक शेर में आतिश का पूरा हुस्न, उनकी पूरी शायराना दुनिया समाई हुई है। इश्क़, ख़ूबसूरती, शोख़ी और वो तड़प जो पुरानी उर्दू ग़ज़लों की जान है। आरज़ू यानी तमन्ना, रूबरू यानी आमने-सामने  और बुलबुल-ए-बेताब यानी वो बुलबुल जो गुल के हुस्न में दीवानी हो चुकी हो। शाब्दिक तौर पर तो शे’र यह कहता है कि हमें तमन्ना थी कि हम अपने महबूब को फूल के सामने बैठते और फिर उस बेचैन बुलबुल से बात करते है।

लेकिन असल मतलब कुछ और है, शायर का मन कहता है कि काश हम अपने गुल-से-ख़ूबसूरत महबूब को असली गुल के सामने ले जाकर बैठते और फिर उस बुलबुल से बहस करते जो गुल की दीवानी है… ये पूछते कि अब बता, कौन ज़्यादा ख़ूबसूरत है तेरा गुल या मेरा महबूब?

यहां आतिश की शोख़-तरीन कल्पना और नफ़ासत दोनों नज़र आती हैं।

आमतौर पर आतिश को दबिस्तान-ए-लखनऊ (Lucknow School of Urdu Poetry) का शायर माना जाता है, पर असलियत ये है कि उनके कलाम में दिल्ली के स्कूल की गहराई और रूहानी ख़ूबसूरती भी मिलती है। लखनऊ की शायरी अक्सर बाहरी नज़ाकत और रंगीनी की तरफ़ झुकती है, जबकि दिल्ली की शायरी में दर्द और भीतरी दुनिया का रंग होता है।

आतिश इन दोनों के बिलकुल बीच खड़े दिखाई देते हैं लखनऊ का रंग है, मगर ख़ुशबू दिल्ली की। इश्क़ उनकी शायरी का बुनियादी मज़मून है, मगर उनका इश्क़ सिर्फ़ बाहरी हुस्न तक महदूद नहीं, उसमें एक रूहानी तपिश है।

उन्होंने कहा-

“शब-ए-वस्ल थी, चांदनी का समां था
बग़ल में सनम था, ख़ुदा मेहरबां था।”

हैदर अली आतिश

और ये भी कहा- 

“किसी ने मोल न पूछा दिल-ए-शिकस्ता का,
कोई ख़रीद के टूटा प्याला क्या करता।”

हैदर अली आतिश

यहां शोख़ी भी है और दर्द भी लेकिन, दिल्लीदारी वाली सादगी के साथ।

आतिश की ज़िंदगी: तलवार, बांकपन और शायरी का अनोखा संगम

आतिश का असल नाम ख़्वाजा हैदर अली था। उनका ख़ानदान बग़दाद से आया था और फ़ैज़ाबाद में बस गया। यहीं उनकी पैदाइश हुई। कहते हैं आतिश गोरे-चिट्टे, ख़ूबसूरत, लंबे-तगड़े और बेहद असरदार शख़्सियत के मालिक थे। कम उम्र में ही वालिद का इंतिक़ाल हो गया और तालीम अधूरी रह गई।

ज़िंदगी में एक वक़्त ऐसा आया जब वो दोस्तों की महफ़िलों, लड़कों की संगत और बांकपन में खो गए। तलवार निकाल लेना उनके लिए आम बात थी और इसी वजह से उनकी सिपाहीयाना शान मशहूर हुई।

इस बांकपन ने नवाब मिर्ज़ा मुहम्मद तकी ख़ां तरक़्क़ी को बहुत मुत्तासिर किया, जिन्होंने उन्हें अपनी ख़िदमत में रख लिया। तरक़्क़ी जब फ़ैज़ाबाद से लखनऊ आए, आतिश भी उनके साथ आ गए और यही लखनऊ का सफ़र उनकी शायरी को नई राह देने वाला साबित हुआ।

लखनऊ में मुसहफ़ी और इंशा जैसे बड़े शायरों का जलवा देखकर आतिश के अंदर का शायर जागा। उन्होंने करीब 29 साल की उम्र में शायरी शुरू की और मुसहफ़ी के शागिर्द बन गए। समय के साथ उनकी महफ़िलें बदलीं, संगत बदली और वो इल्म की तरफ़ रुचि लेने लगे। रात-रात भर किताबों में डूबे रहना, बहसें करना। ये सब उनका हिस्सा बन गया।

आतिश की फ़कीरी और आज़ाद-ख़याली

आतिश का मिज़ाज आज़ाद था। सोच में बेहद उदार, सूफ़ियाना और फ़क़ीराना। उन्होंने कभी पीरी-मुरीदी नहीं की, न किसी अमीर की चाकरी का बोझ लिया।

कहते हैं आख़िरी दिनों में हालत तंग थी, लेकिन घर के बाहर उनका घोड़ा हमेशा बंधा रहता था एक शायर की शान, एक सिपाही की नफ़ासत। वो बांकपन, वो आज़ादी बुढ़ापे तक साथ रही। 1848 में वो लखनऊ में ही इंतिक़ाल कर गए। आख़िरी दिनों में उनकी आंखों की रोशनी जाती रही, मगर कलम की रोशनाई नहीं बुझी।

शायराना अहमियत: मीर-ओ-ग़ालिब के बाद तीसरा बड़ा नाम

फेमस आलोचक राम बाबू सक्सेना ने आतिश को “मीर-ओ-ग़ालिब के बाद उर्दू का तीसरा बड़ा शायर” कहा है। उनका कलाम सिर्फ़ शायरी नहीं, उर्दू ज़बान की जीवंत मिसाल है।
मुहम्मद हुसैन आज़ाद लिखते हैं कि आतिश के अशआर उर्दू मुहावरे की नियमावली हैं जैसे लोग बातें करते हैं, आतिश ने बस उन्हें शेर में ढाल दिया।
उनकी भाषा नासिख़ से कहीं ज़्यादा दिलफरेब और नरम है। जब वो ग़लत-उल-आम (लोक भाषा) का इस्तेमाल करते हैं, तो वो ऐसे लगता है जैसे ख़ूबसूरत चेहरे पर एक तिल।

आतिश की शायरी: उम्मीद, सरमस्ती और ज़िंदगी की चमक

आतिश का कलाम रिंदाना मिज़ाज, ऊंचे ख़याल और आशावादी रंग लिए होता है। उनमें क़लंदराना अंदाज़ भी है, जो ज़िंदगी से लड़ना सिखाता है। उनके कुछ अशआर तो कहावतों की तरह ज़बान पर चढ़ गए हैं—

“सफ़र है शर्त, मुसाफ़िर-नवाज़ बहुतेरे
हज़ारहा शजर सायादार राह में है।”

हैदर अली आतिश

और उनका दिल छू लेने वाला शेर—

“अजब क़िस्मत अता की है ख़ुदा ने अह्ल-ए-ग़ैरत को,
अजब ये लोग हैं ग़म खा के दिल को शाद करते हैं।”

हैदर अली आतिश

इश्क़ और हुस्न की दुनिया में आतिश का फ़लसफ़ा

उनकी ग़ज़लों में इश्क़ एक रोशनी की तरह है चोट भी पहुंचाता है और रास्ता भी दिखाता है। कुछ अशआर देखें:

“ऐ सनम जिस ने तुझे चांद-सी सूरत दी है,
उसी अल्लाह ने मुझ को भी मोहब्बत दी है।”

हैदर अली आतिश

“जो आला-ज़र्फ़ होते हैं हमेशा झुक के मिलते हैं,
सुराही सर-निगूं हो कर भरा करती है पैमाना।”

हैदर अली आतिश

और ये दर्द भरा हुस्न:

“कुछ नज़र आता नहीं उस के तसव्वुर के सिवा,
हसरत-ए-दीदार ने आँखों को अंधा कर दिया।”

हैदर अली आतिश

ख़्वाजा हैदर अली आतिश-उर्दू शायरी का वो नाम, जो आज भी महफ़िलों में अपनी महक छोड़ जाता है।

ये भी पढ़ें: अब्दुल मन्नान समदी: रूहानी एहसास और अदबी फ़िक्र का संगम

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