रामपुरी चाकू (Rampuri Chaku/Knife): नवाबी दौर से ही रामपुर चाकू बनते आ रहे है। यहां चाकू रामपुर की सिर्फ पहचान ही नहीं बल्कि यहां के शिल्प और लोगों की जीविका की भी पहचान है। जब से रामपुर जिला बना उस ज़माने से जिस पैर्टन में चाकू बनाए जाते थे आज भी उसी तरह से बनाए जाते है। साल 2007 में अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय (Ministry of Minority Affairs) ने इसे अल्पसंख्यक बहुल जिले के रूप में मान्यता दी।
चाकूओं के लिए मशहूर ये शहर पहले चीनी और कपास की मिलिंग के लिए भी जाना जाता था। पर जितनी शोहरत रामपुरी चाकू ने इस जगह को दी, वो अपने आप में एक मिसाल है। 100 साल से ज्यादा पुरानी चाकू बनाने की ये कला नवाबों के समय से रामपुर में वास करती आ रही है।
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चाइनीज़ चाकू और रामपुरी चाकू में अंतर
शहज़ाद आलम बताते है कि चाकू अलग-अलग तरह के होते है, लेकिन जो सबसे ज्यादा बिकता है वो बटन वाला चाकू है, जो बटन दबाने से खुलता है। आजकल जो बाज़ारों में चाकू बिक रहे है। उन्हें बनाने का तरीका ठीक नहीं होता है जिसकी वजह से वो जल्दी खराब हो जाते है। जो आम चाकू होते है उनके डिजाइन थोड़े आर्किषित करते है। उन चाकूओं को बनाने वाले जल्दी जल्दी डिजाइन बदलते रहते है। इन चाकूओं को मशीनों की मदद से बनाया जाता हैं। अगर चाइनीज चाकू एक बार गिर जाए तो गिरने के बाद तुरंत खराब हो जाते है।
वहीं रामपुर के चाकू की बात जाए तो अगर उन्हें जमीन पर जोर से पटका भी जाए तो तब भी वो खराब नहीं होते है। यह कहना गलत नहीं होगा कि आपकी और मेरी उम्र से भी ज्यादा उस चाकू की उम्र है। रामपुरी चाकू का काम हाथ से होता है इसकी हत्थे पर की गई नक्काशी हाथों से की जाती है। वहीं रामपुरी चाकूओं का पैर्टन हम नहीं बदल सकते है। अगर हम उसको बदल देंगे तो कस्टूमर उसे पसंद नहीं करेगा। देखा जाए चार से पांच सालों में रामुपुरी चाकू की बिक्री बढ़ी है।
रामपुरी चाकू का इतिहास
शहज़ाद आलम ने DNN24 को बताया कि एक बार रामपुर के नवाब ने जर्मनी से एक चाकू मंगवाया, जो नवाब को बहुत पसंद था क्योंकि वह बटन दबाते ही खुल जाता जाता था। नवाब ने अपनी रियासत की बेहद प्रसिद्ध कारीगर बेचा उस्ताद को बुलाकर उसे हूबहू वैसा ही चाकू बनाने को कहा। कारीगर ने हूबहू वैसा ही चाकू बनाया। जर्मनी का चाकू और कारीगर द्वारा बनाया गए चाकू में किसी भी तरह का अंतर नहीं था। इसके बाद से रामपुर चाकू को एक नई पहचान मिली और कारोबार बढ़ता चला गया।
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500 रूपये से लेकर 3 हजार तक चाकू
रामपुर के चाकू में धार नहीं होती है। सिर्फ वो शो के लिए होता है। लोग अपने घरों में सजाने के लिए ले जाते है। शहज़ाद आलम कहते हैं कि “सबसे पहले चाकू के हैंडल को प्लेट को ढालते है। चाकू पर ब्लेड लोहे और स्टील का लगाया जाता है। पीतल की ढलाई की जाती है उसके बाद हैंडल पर नक्काशी होती है। इसकी खासियत यह है कि इसे बनाने में किसी भी तरह की मशीन का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। इसकी कीमत 500 रूपये से शुरू होती है जो 3 हजार ज्यादा भी हो सकती है। बाकी उसकी क्वालिटी पर निर्भर करता है। जिस तरीके का मटेरियल इस्तेमाल किया जाता है।
इस काम को और बढ़ावा देने के लिए हम सरकार का बहुत शुक्रिया करते है। एक अच्छा कारीगर बनने के लिए 10 साल का समय भी लग सकता है और कम से कम 5 साल का समय भी लग सकता है। कुछ लोग बचपन से ही यह काम कर रहे है उन लोगों को चाकू बनाने के लिए महारथ हासिल है। हम ऑनलाइन सिर्फ छोटे चाकू ही बेच सकते है जिनमे धार नहीं होती है। सरकार ने हमे इसके लिए इज़ाजत दी है।”
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रामपूरी चाकू को सरकार ने दिया बढ़ावा
जबसे उत्तर प्रदेश सरकार ने रामपुरी चाकूओं पर गौर किया और इसे One District One Product में लेकर आए तबसे इसके कारोबार में बढ़ोत्तरी हुई। और हमने इसे बनाने वाले कारीगर बढ़ा दिए। उसके बाद रामपुरी चाकू को लोग दूर-दूर से खरीदने के लिए आने लगे। मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक रामपुर के चाकू को आकर्षण का केंद्र बनाने, उसके इतिहास को बरकरार रखने और पर्यटकों को आर्कषित करने के लिए रामपुर विकास प्राधिकरण द्वारा जिले के जौहर चौक पर रामपुरी चाकू का मॉडल लगाया गया है। जो 20 फीट लंबा और करीब साढ़े आठ क्विंटल से ज्यादा वजनी है। दावा है कि यह दुनिया का सबसे बड़ा रामपुरी चाकू है।
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