उर्दू शायरी की दुनिया में बहुत से नाम ऐसे हैं जिन्होंने अपने दौर में ख़ामोशी से कमाल किया, मगर वक़्त गुज़रने के साथ उनके फ़न की रोशनियां जैसे धुंधलाई नज़र आने लगीं। मोहम्मद मिर्ज़ा रज़ा बर्क़ भी उन्हीं चंद चुनिंदा शायरों में से हैं जिनका तख़य्युल (imagination), तख़ल्लुस (pen-name), और तर्ज़-ए-बयान (style) लखनऊ स्कूल की पूरी नफ़ासत को समेटे हुए है। लेकिन आज उनका ज़िक्र अक्सर किताबों के पन्नों तक ही महदूद रह गया है।
बर्क़ का फ़न, उनका शख़्स, उनका अर्सा-ए-इश्क़ और उनकी शायरी। सब कुछ एक दिलचस्प, असर अंगेज़ और अदबी दास्तान में तब्दील हो जाता है, जिसे समझे बग़ैर उर्दू ग़ज़ल का पूरा इतिहास मुकम्मल नहीं होता।
लखनऊ स्कूल की रवायतें और बर्क़ की शायरी
लखनऊ स्कूल की शायरी की बुनियादी पहचान क्या थी?
- नाज़ुक ख़्याली
- रंगीन तशबीहें और तश्क़ील
- बाहरी ख़ूबसूरती का शिद्दत से बयान
- अल्फ़ाज़ की शान-ओ-शौकत
- इश्क़ में अदाओं और नज़ाकत का ग़ालिब रंग
बर्क़ की शायरी इन तमाम ख़ासियात का आईना है। वो मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी नासिख़ के फ़न से बेहद मुतास्सिर थे, और तशबीह (simile) के इस्तेमाल में नासिख़ के बाद उनका नाम लिया जाता है। बर्क़ के यहां हर तशबीह, हर इस्तिआरा, हर माने जैसे अपने आप में एक छोटा सा चिराग़ जला देता है।
उनके अशआर पढ़ते हुए लगता है कि लखनऊ की तहज़ीब, उसकी नफ़ासत, उसकी रंगीनियों और उसका सलीक़ा। सब शेरों में उतर आया है।
वाजिद अली शाह के उस्ताद का एक अनोखा रिश्ता
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़ का सबसे बड़ा अदबी मर्तबा (honour) यह है कि वे अवध के आख़िरी बादशाह वाजिद अली शाह ‘अख़्तर’ के शाइराना उस्ताद थे। ये वह दौर था जब लखनऊ सिर्फ़ सियासी नहीं, बल्कि तहज़ीबी और अदबी हुकूमत का मरकज़ माना जाता था।
वाजिद अली शाह खुद भी शायरी का बेहद शौक रखते थे। एक बादशाह का किसी शायर से इतना गहरा लगाव अपने आप में इस बात की तस्दीक़ है कि बर्क़ का फ़न कितना बुलंद और कितना मक़बूल रहा होगा। बादशाह और शायर का यह रिश्ता सिर्फ़ उस्ताद-शागिर्द का नहीं था, बल्कि मोहब्बत और एतमाद का भी रिश्ता था, जो उनकी ज़िंदगी के आख़िरी वक़्त तक क़ायम रहा।
बर्क़ का आख़िरी सफ़र
1856 में जब अंग्रेज़ों ने वाजिद अली शाह को गिरफ़्तार किया और उन्हें फोर्ट विलियम कॉलेज, कलकत्ता में नज़रबंद कर दिया, तो बर्क़ भी उनके साथ वहीं मौजूद थे। ये वफ़ादारी, ये इख़्लास और ये जुड़ाव, उर्दू अदब के इतिहास में कम ही देखा जाता है।
कलकत्ता की क़ैदगाह में माहौल उदास था। बादशाह अपने वतन से दूर, अपनी सल्तनत से महरूम… और बर्क़ अपने बादशाह और शागिर्द के ग़म में डूबे हुए। इसी दमघोंटू फिज़ा में बर्क़ की तबियत बिगड़ने लगी और 1857 में, उसी शहर में उन्होंने दुनिया को ख़ैरबाद कह दिया।
ये इत्तेफ़ाक़ भी कितना अजीब है कि जिस साल मुल्क में बग़ावत की चिंगारी उठी, उसी साल लखनऊ के इस फ़नकार का दीया भी बुझ गया।
दीवान-ए-बर्क़ और उनका अदबी असार
बर्क़ का दीवान 1852 में मतबा-ए-सुल्तानी से मुद्रित हुआ था। यह उस दौर के लिहाज़ से बहुत बड़ा काम था क्योंकि शायरी की किताबें छपवाना एक नायाब बात मानी जाती थी।
उनकी शायरी में—
- ग़ज़ल
- रुबाई
- क़ता
- मुख़म्मस
- शहर-ए-आशोब
- वासोख़्त
जैसी कई अस्नाफ़ (genres) मिलते हैं। शहर-ए-आशोब में उन्होंने ज़िंदगी के बिखराव, समाज की तबाही और हालात की उलटफेर को बड़ी ख़ूबसूरती से बयान किया। वासोख़्त में उन्होंने इश्क़ के टूटने, तन्हाई और शिकस्त का रंज बयान किया।
बर्क़ के शागिर्द: एक पूरी नस्ल की तर्बियत
बर्क़ के आउन-शौन (repute) का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके दर्जनों शागिर्द थे और उनमें से कई ने बड़ी शोहरत हासिल की, जैसे—
- सैयद ज़मीन अली
- शेख़ अमान अली सेहर
- हादी अली अश्क़
यह शायर आगे चलकर उर्दू ग़ज़ल को नई दिशाएं देने में कामयाब हुए और इसकी बुनियाद बर्क़ के पास बैठ कर सीखी गई फ़नकारी में मौजूद थी।
बर्क़ के चुनिंदा अशआर और उनका असर
अब आइए उनके कुछ उम्दा और दिलदर्ज़ अशआर पर नज़र डालें, जो उनकी शायरी के सौंदर्य और गहराई को साबित करते हैं।
1. तदबीर बनाम तक़दीर
ऐ सनम वस्ल की तदबीरों से क्या होता है
वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है
ये शेर इश्क़ की मजबूरियों का बयान भी है और इंसानी बेबसी का एतराफ़ भी। बर्क़ कह रहे हैं कि मिलन की जितनी भी कोशिशें हों, आख़िरकार वही होता है जो क़ुदरत लिख दे। इसमें सूफ़ियाना रंग भी झलकता है।
2. तशबीह की नज़ाकत
मिसाल-ए-तार-ए-नज़र क्या नज़र नहीं आता
कभी ख़याल में मू-ए-कमर नहीं आता
यह तशबीह की वह ऊंचाई है जहां नासिख़ का असर साफ़ दिखता है। नज़र की डोर, कमर के बाल- क्या नफ़ासत है! इसी अंदाज़ ने लखनऊ स्कूल को बाक़ियों से अलग किया।
3. इंसान के ऐब और हुनर
हमारे ऐब ने बे-ऐब कर दिया हम को
यही हुनर है कि कोई हुनर नहीं आता
यह शेर एक अजीब-सी उलझी हुई सादगी लिए हुए है। शायर कहता है मेरा ऐब ही मेरी पहचान बन गया। यह तज़ाद (paradox) बर्क़ की फ़लसफ़ाना सोच को दर्शाता है।
4. मलाल का मलाल
इतना तो जज़्ब-ए-इश्क़ ने बारे असर किया
उस को भी अब मलाल है मेरे मलाल का
कितना महीन इश्क़!, यहां शायर का ग़म इतना सच्चा है कि महबूब को भी अब उस ग़म का एहसास होने लगा है। इश्क़ की यही नज़ाकत लखनऊ स्कूल की रूह है।
5. मुलाक़ात की तड़प
किस तरह मिलें कोई बहाना नहीं मिलता
हम जा नहीं सकते उन्हें आना नहीं मिलता
यह शेर आज भी उतना ही ताज़ा लगता है। दूरी, मजबूरियां और चाहत। तीनों एक जुमले में समा गए।
6. दिल का हाल और आह
पूछा अगर किसी ने मिरा आ के हाल-ए-दिल
बे-इख़्तियार आह लबों से निकल गई
बर्क़ के यहां ‘आह’ सिर्फ़ आवाज़ नहीं बल्कि एक तर्जुमा है दिल की हालत का, इश्क़ की पीड़ा का, और इंसान की बेबसी का।
7. अंगड़ाई की तशबीह—लखनऊ की शान
अंगड़ाई दोनों हाथ उठा कर जो उस ने ली
पर लग गए परों ने परी को उड़ा दिया
यह शेर पूरी तरह लखनऊ की नफ़ासत का नमूना है। महबूब की अंगड़ाई को एक परी की उड़ान से जोड़ देना। यह सिर्फ़ बर्क़ ही कर सकते थे।
8. ज़ुल्फ़ का जादू
असर ज़ुल्फ़ का बरमला हो गया
बलाओं से मिल कर बला हो गया
ज़ुल्फ़ और बला – उर्दू शायरी के दो पुराने प्रतीक। मगर बर्क़ जिस अंदाज़ में इन्हें मिलाते हैं, वह बेजोड़ है।
मोहम्मद मिर्ज़ा रज़ा बर्क़ का नाम वाज़िद अली शाह की शायरी के ज़िक्र के साथ आता तो है, लेकिन उनका अपना फ़न, उनका हुनर, उनकी इल्मी और फ़न्नी काबिलियत—अक्सर पीछे रह जाती है।
- वह लखनऊ स्कूल के अहम उस्तादों में से एक थे
- उन्होंने उर्दू ग़ज़ल को तशबीह और नफ़ासत का नया अंदाज़ दिया
- वह एक बादशाह के शाइराना उस्ताद थे
- उनका दीवान उनके फ़न का ज़िंदा सबूत है
- उनके शागिर्दों ने उर्दू अदब को नई बुलंदियों तक पहुंचाया
बर्क़ की शायरी सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि महसूस करने के लिए है। उनके हर शेर में लखनऊ की वह नफ़ासत है, जो आज भी उर्दू अदब के लिए एक विरासत की तरह है।
ये भी पढ़ें: अब्दुल मन्नान समदी: रूहानी एहसास और अदबी फ़िक्र का संगम
आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।


