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ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी: एक ‘उस्ताद-उल-उस्ताद’ की दास्तान-ए-हयात और उनका ग़मगीन फ़न

ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी, उर्दू अदब की उस आलीशान इमारत के मज़बूत सुतूनों में से एक हैं, जिनकी ज़िंदगी फ़ाक़ा-मस्ती, अदबी जद्दोजहद और बेपनाह मश्शाक़ी (महारत) की एक हंसती-रोती दास्तान है। उनका असल नाम ग़ुलाम हमदानी था और ‘मुसहफ़ी’ उनका तख़ल्लुस, जिसके मानी हैं ‘सहीफ़े वाला’ या ‘किताब वाला’। इस तख़ल्लुस ने उनकी अदबी हस्ती को हमेशा के लिए अमर कर दिया।

अक्सर तज़्किरा-निगारों ने उनकी ज़ादगाह (जन्म स्थान) अमरोहा को क़रार दिया है, मगर कुछ मोतबर रिवायतें, जैसे कि मुहज़्ज़ब लखनवी की, मीर हसन के हवाले से ये बताती हैं कि उनकी पैदाइश दिल्ली के क़रीब अकबरपुर में हुई थी। बहरहाल, उनका बचपन अमरोहा की गलियों में गुज़रा। मुसहफ़ी एक ऐसे ख़ानदान की आंख का तारा थे जिसके बाप-दादा कभी हुकूमत के आला ओहदों पर फ़ाइज़ थे।

मगर, अफ़सोस! सल्तनत की ज़वाल-पज़ीरी (पतन) ने उनकी क़िस्मत का नक़्शा भी पलट दिया। शहंशाहियत के ढलते साए के साथ ही, उस ख़ानदान की दौलत-ओ-इज्ज़त भी रुख़सत हो गई, और मुसहफ़ी की तमाम उम्र माआशी तंगी (आर्थिक तंगी) और रोज़गार की तलाश में दर-बदरी की भेंट चढ़ गई।

रोज़गार की चिंता उनको कई जगह भटकाती रही। वो दिल्ली आए… आजीविका की तलाश में वो आंवला गए फिर कुछ अर्सा टांडे और एक साल लखनऊ में रहे।

ये दर-बदरी उनकी शायरी के रंग में गहराई पैदा करती चली गई। उन्होंने दिल्ली में क़दम रखा, जहां उन्होंने रोज़ी-रोटी की जुस्तुजू के साथ-साथ अहले-इल्म (विद्वानों) और फ़नकारों की सोहबत से फ़ैज़ हासिल किया। यहीं, इसी जद्दोजहद के दौरान, वह अदब के उस मुकाम की जानिब गामज़न हुए जहां उस्तादी उनका मुक़द्दर बनने वाली थी।

शायरी का आग़ाज़ और सौदा से मुलाक़ात

इल्मी लियाक़त के लिहाज़ से मुसहफ़ी के पास ज़ाहिरी सनदें ज़्यादा नहीं थीं, मगर तबीयत की मौज़ूंयत (उपयुक्तता) और शायरी का इल्हाम उनका सबसे बड़ा सरमाया था। वह अपना एक मुक़ाम बनाने की ख़्वाहिश रखते थे। दिल्ली में, वह बिला-नाग़ा मुशायरों की रौनक़ बनते और अपने मकान पर भी बज़्म-ए-शायरी सजाते थे।

इसी ज़माने में उन्होंने दो दीवान संकलित किए, मगर अफ़सोस की इब्तिदाई तकलीफ़ें यहां भी उनका पीछा न छोड़ सकीं और उनका एक क़ीमती दीवान चोरी हो गया।

ऐ ‘मुसहफ़ी’ शायर नहीं पूरब में हुआ मैं
दिल्ली में भी चोरी मिरा दीवान गया था

ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी

यह शेर उनकी उस तकलीफ़देह हक़ीक़त को बयान करता है कि दौलत-ओ-इज्ज़त के साथ-साथ उनका अदबी सरमाया भी महफ़ूज़ न रह सका।

दिल्ली से निकलकर वो आंवला गए, फिर टांडा और आख़िरकार लखनऊ पहुंचे। लखनऊ का यह क़याम उनकी अदबी ज़िंदगी का एक अहम पड़ाव साबित हुआ, जहां उनकी मुलाक़ात उस वक़्त के ज़बरदस्त उस्ताद-ए-शाइर मीर मुहम्मद तक़ी ‘सौदा’ से हुई, जो फ़र्रुख़ाबाद से लखनऊ हिजरत कर चुके थे। सौदा के फ़न और शख़्सियत ने मुसहफ़ी को बेपनाह मुतास्सिर किया। यह मुलाक़ात मुसहफ़ी की शायरी की तरबियत और मयार को बुलंद करने में मील का पत्थर साबित हुई।

लखनऊ का दूसरा दौर: उस्तादी और इंशा से मुक़ाबला

तक़रीबन 12 साल दिल्ली में गुज़ारने के बाद, जब मुसहफ़ी साहब दोबारा लखनऊ पहुंचे, तो शहर का नक़्शा बदल चुका था। ये नवाब आसिफ़उद्दौला का दौर था, जिनकी सख़ावत (उदारता) के ढंके पूरे मुल्क में बज रहे थे। हर फ़न और हुनर के माहिर इस शहर में खींचे चले आ रहे थे। सौदा का इंतकाल हो चुका था, मगर मीर तक़ी मीर लखनऊ आ चुके थे, मीर हसन यहां आबाद थे, और मीर सोज़ और जुरअत का सिक्का जमा हुआ था। 

इन अज़ीम उस्तादों की मौजूदगी में, मुसहफ़ी को आसिफ़उद्दौला के शाही दरबार से कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ। लिहाज़ा, वह दिल्ली के शहज़ादे, सुलेमान शिकोह की सरकार से वाबस्ता हो गए, जिन्होंने लखनऊ को ही अपना ठिकाना बना लिया था।

सुलेमान शिकोह ने मुसहफ़ी को अपना उस्ताद-ए-शाइरी मुक़र्रर किया और उनकी अदबी ख़िदमात के एवज़ 25 रुपये माहवार वज़ीफ़ा (पेंशन) बांध दिया। इस मुक़ाम पर पहुंचकर, मुसहफ़ी को कुछ देर के लिए माआशी सुकून नसीब हुआ।

मगर, यह सुकून ज़्यादा देर बाक़ी न रह सका। उसी ज़माने में, सय्यद इंशाउल्लाह ख़ां ‘इंशा’ लखनऊ आए। इंशा, अपनी हाज़िर जवाबी, लतीफ़ागोई, शोख़ी और ज़राफ़त (हास्य) के मालिक थे। जल्द ही उन्होंने सुलेमान शिकोह को अपनी ज़हनी क़ाबिलियत से मुतास्सिर कर दिया और शहज़ादे ने उनसे इस्लाह (सुधार) लेना शुरू कर दिया।

इंशा लखनऊ में मुसहफ़ी के सबसे बड़े हरीफ़ (प्रतिद्वंद्वी) बनकर उभरे। दोनों की नोक-झोंक मुशायरों की महफ़िलों से निकलकर शहर की सड़कों तक आ गई। मुसहफ़ी की ताक़त उनके शागिर्दों की बड़ी तादाद थी, जबकि इंशा की ताक़त उनकी ज़हन की तेज़ी और चुटकी थी, जो मुख़ालिफ़ को रुला देने की क़ुव्वत रखती थी। मुसहफ़ी उनकी चुटकियों का मुक़ाबला नहीं कर पाते थे।

फ़न की अज़्मत और उस्तादी का सिक्का

मुसहफ़ी की शागिर्दों की तादाद इतनी ज़्यादा थी कि अगर उन्हें “उस्ताद-उल-उस्ताद” कहा जाए, तो बेजा (ग़लत) न होगा। ख़्वाजा हैदर अली ‘आतिश’, असीर, मीर ख़लीक़ जैसे अज़ीम शायर उनके शागिर्द थे।

मुसहफ़ी अपनी शायरी के बारे में बड़े ख़ुद-ए’तिमाद थे। वह मीर और सौदा के बाद ख़ुद को सबसे बड़ा शाइर समझते थे, और अपनी उस्तादी का सिक्का जमाना उनकी आदत में शुमार था। आतिश के साथ उनका एक वाक़िया उनकी कलाम पर बे-मिस्ल महारत और हाज़िर दिमागी को ज़ाहिर करता है। एक मुशायरे में, जब आतिश ने एक ग़ज़ल पढ़ी और अपने उस्ताद के सामने यह शेर पढ़ा:

लगे मुंह भी चिढ़ाने देते देते गालियां साहब
ज़बां बिगड़ी तो बिगड़ी थी ख़बर लीजे दहन बिगड़ा

ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी

कलाम की रंगारंगी और ख़ुद का ‘रंग’

मुसहफ़ी की शायरी के बारे में एक आम ख़्याल यह है कि उनका अपना कोई ख़ास ‘रंग’ या ‘अंदाज़’ नहीं। कहा जाता है कि वह कभी मीर की तरह, कभी सौदा की तरह और कभी जुरअत की तरह शेर कहने की कोशिश करते हैं, और अपने शे’रों में इन उस्तादों से पीछे रह जाते हैं। 

इस राय की वजह यह बताई जाती है कि उन्हें ‘अपना रंग तलाश करने के लिए जिस निश्चिंतता और एकाग्रता की ज़रूरत होती है,’ वह मुसहफ़ी को कभी नसीब ही नहीं हुई। उनकी सारी ज़िंदगी रोज़ी की फ़िक्र और माआशी तकलीफ़ों में गुज़री। कहने की कसरत ने उनके कई क़ीमती नगीनों को धुंधला दिया। यहां तक कि एक वक़्त ऐसा आया कि वह आर्थिक तंगी से मजबूर होकर मुशायरों में अपनी ग़ज़लें बेचने लगे थे।

एक ख़ाकसारी का ख़ज़ाना

मुसहफ़ी अपने पीछे अदबी सरमाये का एक पूरा ख़ज़ाना छोड़ गए। उन्होंने:

  • आठ दीवान उर्दू के
  • एक दीवान फ़ारसी का
  • एक तज़किरा फ़ारसी शायरों का
  • दो तज़किरे उर्दू शायरों के

मुसहफ़ी की सारी ज़िंदगी तकलीफ़ में गुज़री, मगर उन्होंने अपने दर्द और ग़म को शायरी की सबसे हसीन शक्ल दी। वह एक ऐसे शाइर थे, जिन्हें ज़िंदगी ने न खुलकर हंसने का मौक़ा दिया और न ही खुलकर रोने का। मगर उन्होंने अपने पीछे जो शायरी का सरमाया छोड़ा है, वह उनके शाश्वत जीवन (अमरता) का ज़ामिन (ज़मानतदार) है।

उनका कलाम उनकी ग़मगीन हयात (दुखद जीवन) का आईना है, जिसमें ग़म-ए-जानां और ग़म-ए-दौरां की हक़ीक़त बड़ी शिद्दत से महसूस होती है।

अभी आग़ाज़-ए-मोहब्बत है कुछ इस का अंजाम
तुझ को मालूम है ऐ दीदा-ए-नम क्या होगा

हसरत पे उस मुसाफ़िर-ए-बे-कस की रोइए
जो थक गया हो बैठ के मंज़िल के सामने

मूसा ने कोह-ए-तूर पे देखा जो कुछ वही
आता है आरिफ़ों को नज़र संग-ओ-ख़िश्त में

दिल्ली में अपना था जो कुछ अस्बाब रह गया
इक दिल को ले के आए हैं उस सरज़मीं से हम

ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी

मुसहफ़ी, अपनी फ़ाक़ा-मस्ती, अदबी रक़ाबत और रोज़गार की जद्दोजहद के बावजूद, उर्दू ग़ज़ल के एक ऐसे आली मक़ाम पर फ़ाइज़ हैं, जहां उनका नाम मीर और सौदा की सफ़ में इज़्ज़त से लिया जाता है। उनकी शायरी में ज़िंदगी की तमाम कड़वी और मीठी हक़ीक़तें इस तरह घुल-मिल गई हैं कि वो हर दौर के पढ़ने वाले के दिल को छू लेती हैं।

उनका यह सफ़रनामा, ज़िंदगी की बे-रुख़ी के सामने फ़न के मज़बूत इरादे की फ़तेह का ऐलान है। ग़ुलाम हमदानी ‘मुसहफ़ी’ हमेशा अपने कलाम की रोशनी में उर्दू अदब के आसमान पर एक चमकता सितारा बने रहेंगे।

तज़्किरा-ए-मुसहफ़ी का ख़ास अंदाज़

मुसहफ़ी को सिर्फ़ एक शायर कहना उनके साथ इंसाफ़ नहीं। वह अपने वक़्त के एक बड़े अदीब, मुअल्लिफ़ और तज़्किरा-निगार भी थे। उनके तज़्किरे (शायरों की जीवनियां और कलाम का संकलन) उर्दू अदब की तारीख़ को समझने के लिए बेहद ज़रूरी माख़ूज़ (स्रोत) हैं। अपने तज़्किरों में उन्होंने अपने हम-असर (समकालीन) और अपने से पहले के शायरों की ज़िंदगी और कलाम को दर्ज करके उर्दू अदब पर एक बहुत बड़ा एहसान किया है। अगर मुसहफ़ी इन तज़्किरों को न लिखते, तो बहुत से शायरों का कलाम हम तक शायद ही पहुंच पाता।

यह माआशी तकलीफ़ का ही नतीजा था कि उन्होंने एक मौक़े पर तंग आकर अपनी ग़ज़ल ज़मीन पर दे मारी और कहा कि “वाए फ़लाकत स्याह, जिसकी बदौलत कलाम की ये नौबत पहुंची कि अब कोई सुनता नहीं।” यह अल्फ़ाज़ उनके दर्द को बयान करते हैं। मगर इसी दर्द ने उन्हें वह मश्शाक़ी और गहराई दी, जिसने उन्हें उस्तादी के आला मक़ाम पर पहुंचाया।

मुसहफ़ी की शख़्सियत और शायरी, पुरानी दिल्ली और लखनऊ की अदबी रिवायतों के बीच एक पुल की हैसियत रखती है। वह वह शाइर हैं जिन्होंने मीर की ग़मगीनियत और सौदा की ज़ोर-दार बयां-बाज़ी को लखनऊ के रिंदाना (मस्ती भरे) और शोख़ अंदाज़ से मिलाया।

उनकी शाइरी आज भी अदब के तालिब-ए-इल्मों और शाइरी के शायक़ीनों के लिए इल्म और फ़न का एक बे-बहा सरमाया है।

ये भी पढ़ें: अब्दुल मन्नान समदी: रूहानी एहसास और अदबी फ़िक्र का संगम

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