संगीत सिर्फ़ कानों से ही नहीं सुना जाता, दिल से भी महसूस किया जाता है। और जब ये संगीत पीढ़ियों की मेहनत, साधना और विरासत से जुड़ा हो, तो वो सिर्फ़ कला नहीं, एक ज़िम्मेदारी बन जाता है। DNN24 के Diverse Dialogue Podcast में इस बार बातचीत हुई ऐसे ही एक कलाकार से, जिनके लिए तबला सिर्फ़ एक वाद्य नहीं, बल्कि साधना है। हम बात कर रहे हैं Prince of Tabla – प्रांशु चतुर्लाल की, जो महान तबला वादक पंडित चतुर्लाल जी की विरासत को आज की पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं।
वो घर, जहां संगीत सांसों में बसता था
Pranshu Chatur Lal का जन्म एक ऐसे घर में हुआ, जहां संगीत किसी शौक़ या कोर्स का हिस्सा नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा था। इस घर में सुबह की शुरुआत रियाज़ से होती थी और शाम सुरों में ढलती थी। उनके दादाजी पंडित चतुर्लाल जी भारत के उन गिने-चुने तबला वादकों में से थे, जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। उन्होंने उस दौर में तबले को वैश्विक पहचान दिलाई, जब भारतीय संगीत को सीमित दायरे में देखा जाता था।
ऐसे माहौल में जन्म लेने के बाद संगीत से दूरी बनाना लगभग असंभव था। लेकिन इसके बावजूद, परिवार ने कभी Pranshu Chatur Lal पर संगीत सीखने का दबाव नहीं डाला। उनके पिता का साफ़ मानना था कि संगीत ज़बरदस्ती नहीं, प्रेम और जिज्ञासा से सीखा जाना चाहिए। उनका पढ़ाने का तरीका भी उतना ही सहज और अनोखा था।
उन्होंने तबले के चार मूल बोल – धा, धिन, धिन, धा को कार के चार गियर से जोड़कर समझाया। जैसे गाड़ी पहले गियर से धीरे-धीरे चौथे गियर तक बढ़ती है, उसी तरह ताल भी आगे बढ़ती है। इस सरल उदाहरण ने बच्चे के मन में ताल की संरचना और लय का गणित बैठा दिया। यही वजह रही कि बहुत कम उम्र में ही Pranshu Chatur Lal तबले के साथ सहज हो गए।

नौ साल की उम्र में पहला अंतरराष्ट्रीय मंच
बचपन में Pranshu Chatur Lal का स्वभाव काफी शर्मीला था इस बातचीत के दौरान उन्होंने एक किस्सा बताया कि जब उनका स्कूल में एडमिशन के इंटरव्यू हुआ तो वो कुछ जवाब नहीं दे पाएं तब उनके पिता ने उनसे कहा कि कुछ तबले के बोल सुना दो, उन्होंने तबले के कुछ बोल सुनाएं तब उनका एडमिशन हुआ। स्कूल के दिनों में उन्होंने लगातार कई मंचों पर परफॉर्म किया।
जिस बच्चे ने तीन साल की उम्र में तबले को एक खेल की तरह छुआ था, उसी बच्चे ने नौ साल की उम्र में अमेरिका में अपना पहला इंटरनेशनल परफॉर्मेंस दिया। ये सिर्फ़ एक प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि इस बात का इशारा था कि ये बच्चा आम नहीं है। इस मंच ने उन्हें आत्मविश्वास दिया और ये एहसास कराया कि उनका संगीत सिर्फ़ घर या देश तक सीमित नहीं रहेगा।
अनुशासन, मेहनत और रोज़ का अभ्यास
Pranshu Chatur Lal बताते हैं कि उनके पिता जी स्टूडेंट्स को क्लासिस देते थे। वो स्कूल से वापस आकर और सभी काम पूरा करने के बाद रियाज़ किया करते थे। जहां बाकी बच्चे स्कूल, ट्यूशन और होमवर्क के बाद खेलने जाते थे, वहीं Pranshu Chatur Lal के लिए रियाज़ ही खेल था। आज भी वो मानते हैं कि सीखने की प्रक्रिया कभी खत्म नहीं होती। उनके लिए मंच पर परफॉर्म करना भी रियाज़ का ही एक हिस्सा है। वो कहते हैं “बुज़ुर्गों ने सही कहा है कि स्टेज पर परफॉर्म करना एक अलग रियाज़ होता है लेकिन जब भी समय मिलता है, मैं नई-नई चीज़ें खोजता और बनाता हूं।”

ताल की सरलता में छुपी गहराई
Pranshu Chatur Lal बताते हैं कि कई तालें देखने में आसान लगती हैं, लेकिन बजाने में बेहद गहरी होती हैं। तीन ताल, जो सबसे सरल मानी जाती है, असल में सबसे मुश्किल होती है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में साढ़े सात, पौने आठ और तिगुन जैसी जटिल लय होती हैं, जहां एक मात्रा के अंदर कई बीट्स होती हैं। यही ख़ासियत तबले को अनोखा और चुनौतीपूर्ण बनाती है। कथक संगत पर बात करते हुए वो कहते हैं कि तबला सिर्फ़ ताल मिलाने का वाद्य नहीं है। वह नर्तक के भाव, चेहरे के एक्सप्रेशन और मूवमेंट्स को पढ़ता है।
दादा पंडित चतुर्लाल: अपने समय से बहुत आगे
Pranshu Chatur Lal अपने दादाजी को सिर्फ़ गुरु नहीं, भगवान की तरह मानते हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि साल 1956 में ही पंडित चतुर्लाल जी ने फ्यूज़न संगीत की नींव रख दी थी। वाशिंगटन डीसी में तबले और वेस्टर्न ड्रम्स की जुगलबंदी हुई थी, जिसका वीडियो आज भी Library of Congress में सुरक्षित है।
Pranshu Chatur Lal के पिता जी उन्हें बताते हैं कि उन दिनों दादा जी की करियर बुलंदियों पर था। जब भी वो घर आते तो बच्चों को रियाज़ कराते थे। उनकी आदत थी कि काम पर जाने से पहले अपने हाथों से सभी बच्चों को एक निवाला खिलाते थे। प्रांशु के पिता सिर्फ़ 9 साल के थे, जब उनके दादाजी दुनिया से रुख़्सत हो गए।
पंडित चतुर्लाल जी के जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से करीबी रिश्ते थे। उनके सम्मान में दिल्ली में उनके नाम का ‘पंडित चतुर्लाल मार्ग’ बनाया गया। ये मार्ग 2011 में उनके योगदान के लिए बनाया गया था। Pranshu Chatur Lal बताते हैं कि गूगल मैप पर ये सड़क “C” और “L” जैसे आकार में दिखती है मानो उनके दादाजी के नाम का निशान हो।

बड़े मंच, बड़ी हस्तियां के साथ अनुभव
Pranshu ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और श्रीलंका के राष्ट्रपति के सामने प्रस्तुति दी है। इसके अलावा उन्होंने साउथ के प्रसिद्ध बांसुरी वादक विजयगोपाल, अनूप जलोटा, राजन-साजन और हरिप्रसाद चौरसिया जैसे दिग्गजों के साथ कार्यक्रम किए। वो कहते हैं कि सीनियर कलाकारों के साथ काम करते हुए मन में डर ज़रूर रहता है, लेकिन सभी ने उन्हें बेहद सहज और सम्मानित महसूस कराया।
Pranshu Chatur Lal ने पंडित बिरजू महाराज जी के साथ वक्त बिताया है। वो बताते हैं कि जब वो पहली बार उनसे मिले तो वो छठवीं क्लास में थे मिलने का मक़सद था कि कथक के साथ तबला कैसे बजाया जाता है? उनका मानना है कि कथक में चेहरे के हाव भाव और मूवमेंट्स के साथ तबला बजाना होता है जोकि काफी मुश्किल होता है।
बर्लिन की तालियां और संगीत की भाषा
साल 2005 में बर्लिन में उनका सोलो कॉन्सर्ट हुआ। जब कार्यक्रम खत्म हुआ, तो ऑडियंस 15–20 मिनट तक “Once more” चिल्लाती रही। घबराकर उन्होंने पिता की ओर देखा। जवाब मिला “बस बजाते रहो।” उसी दिन उन्हें एहसास हुआ कि संगीत की कोई भाषा नहीं होती। Pranshu Chatur Lal बताते हैं कि जब लोगों की कुछ फरमाइश आती हैं तो मैं उन्हें अक्सर अलग अलग तरह की बीट्स सुनाता हूं जैसे ट्रेन की आवाज़, मोर की चाल या कबूतर की गुटर गूं की आवाज़ ।

अध्यात्म: जब समय का अस्तित्व मिट जाता है
Pranshu Chatur Lal कहते हैं कि “हम ट्रांस में चले गए,” तो उसका मतलब यही होता है कि हमें पता ही नहीं चलता कि कितना समय बीत गया। मन पूरी तरह एक चीज़ से जुड़ जाता है, और बाकी सब अपने-आप पीछे छूट जाता है। ये माइंड की एक बहुत ही ख़ास कंडीशन होती है। वो बताते हैं कि “जब मैं अपने पिताजी के साथ अमेरिका में था। एक सुबह हम दोनों रियाज़ करने बैठे थे।
पिताजी मुझे संगत को लेकर कुछ ज़रूरी टिप्स सिखा रहे थे। साथ ही हम मेरे दादाजी पंडित चतुर्लाल जी की रिकॉर्डिंग सुन रहे थे और पंडित रविशंकर जी के साथ उनके तबले की संगत पर चर्चा कर रहे थे। पिताजी समझा रहे थे कि असली संगत क्या होती है। हम इस अभ्यास और बातचीत में इतने डूब गए कि हमें खुद पता ही नहीं चला कि समय कैसे बीत गया।”
लगभग 8 से 10 घंटे कब निकल गए, इसका हमें कोई अंदाज़ा ही नहीं था। शाम को जब उनकी मां और बहन बाहर से लौटे, तो उन्होंने देखा वो उसी जगह, उसी पोज़िशन में बैठे हुए थे। उन्हें याद है, उस दौरान ना पानी मांगा, ना वॉशरूम गया, ना ही भूख का कोई एहसास हुआ। यह अनुभव साल 2003–2004 के आसपास का है। उस समय मैं लगभग 12–13 साल का था। इतनी कम उम्र में इस तरह संगीत में पूरी तरह डूब जाना, मेरे लिए एक बहुत गहरा और खास अनुभव था। शायद यही वजह है कि तबला मेरे लिए सिर्फ़ एक इंस्ट्रूमेंट नहीं, बल्कि साधना बन गया।
पंडित चतुर्लाल सोसाइटी और नई पीढ़ी
दिल्ली में पंडित चतुर्लाल सोसाइटी मौजूद है इसके फाउंडर Pranshu Chatur Lal के पिताजी हैं। इसका रजिस्ट्रेशन साल 1990 में हुआ था। उसी समय से उन्होंने इस संगठन को एक स्पष्ट कॉन्सेप्ट के साथ आगे बढ़ाना शुरू किया। इस सोसाइटी के ज़रिए वो दिल्ली के बाहर भी कॉन्सर्ट्स और म्यूज़िकल प्रोग्राम आयोजित करते हैं।
लगभग सभी बड़े कलाकारों ने इस सोसाइटी के मंच पर परफॉर्म किया है। ये संस्था हम अपने ग्रैंडफादर की याद में चलाते हैं। यहां दिल्ली के अलावा अलग-अलग जगहों से स्टूडेंट्स भी सीखने के लिए आते हैं। “इस समय मैं खुद यहां क्लासेस ले रहा हूं और बच्चों को म्यूज़िक सिखा रहा हूं। मैं उन्हें सबसे पहले यही समझाता हूं कि अगर आप बेसिक हाथ चलाना और सही तकनीक सीख लेते हैं, तो आगे जाकर सब कुछ आसान हो जाता है।”

जब चार घंटे रियाज़ के बाद मिला खिलौना
एक दिन Pranshu Chatur Lal को एक रोबोट पसंद आया लेकिन उनके पिताजी ने उसे खरीदने के लिए एक शर्त रखी। शर्त थी कि करीब चार घंटे बैठकर रियाज़ करना होगा। चार-पांच साल की उम्र में चार घंटे का रियाज़ करना आसान नहीं था। लेकिन खिलौने की चाहत ने उनसे चार घंटे रियाज़ करवाया और पिता हैरान रह गए। उनकी इस कामयाबी को देखकर पिता ने उन्हें तोहफे में वही रोबोट लाकर दिया।
सोशल मीडिया और नई पीढ़ी
Pranshu Chatur Lal मानते हैं कि आज की पीढ़ी शास्त्रीय संगीत से दूर नहीं है। बस उनका ज़रिया बदल गया है। ऐसा हो सकता है कि लोग सोचते है कि लोग वेस्टर्न म्यूज़िक की तरफ ज़्यादा अट्रैक्ट होते हैं, और भारतीय शास्त्रीय संगीत से अलग होते हैं जा रहे हैं। लेकिन ऐसा नहीं है बाहर के लोगों को भारतीय शास्त्रीय संगीत काफी पसंद है। और हमारे कल्चर की तरफ भी बहुत अट्रैक्ट होते है।
Pranshu Chatur Lal बताते हैं कि उनके जापान से एक दोस्त है उन्होंने करीब 20 साल कोलकाता में रहकर सीखा है। और अब वो बहुत अच्छी बंगाली बोलते है और खाना बनाते हैं। सोशल मीडिया ज़रूरी है, लेकिन जड़ों से जुड़े रहना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है। Pranshu Chatur Lal ड्रम्स और वोकल परकशन भी करते हैं, लेकिन उनकी पहचान तबला ही है। उनके लिए तबला शो का हिस्सा नहीं, साधना है। उनकी कहानी यही सिखाती है कि विरासत बोझ नहीं होती अगर उसे ईमानदारी से निभाया जाए।
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