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मह लक़ा चंदा: उर्दू की पहली रौशन ख़ातून-ए-शायरा

उर्दू अदब का इतिहास जब भी अपने सुनहरे सफ़ों को पलटता है, तो कुछ नाम ऐसे चमकते हैं जिन्हें नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन है। इन्हीं नामों में एक है-मह लक़ा चंदा बाई, जिनकी ज़िंदगी, फ़न और शायरी ने उर्दू अदब को एक नई बुलंदी दी। वो सिर्फ़ एक शायरा नहीं थीं, बल्कि एक ऐसा रौशन चराग़ थीं जिन्होंने हैदराबाद दक्कन की तहज़ीब, अदब और फ़न को अपनी मौजूदगी से नूरानियत दी।

मह लक़ा बाई का नाम जितना नफ़ीस है, उतनी ही नफ़ासत उनकी शायरी और उनके अंदाज़ में थी। वो उर्दू की पहली महिला शायरा थीं जिनका अपना मुकम्मल दीवान मौजूद है एक ऐसा कारनामा जो उनके ज़माने में किसी भी ख़ातून के लिए आसान न था।

चंदा बीबी से मह लक़ा बाई तक का सफ़र

मशहूर शायरा मह लक़ा बाई चंदा की पैदाइश 7 अप्रैल 1768 को औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में हुई। बचपन में उनका नाम चंदा बीबी था। उनकी वालिदा राजकुंवर पेशे से तवाइफ़ थीं और राजपूताना से हिजरत कर दक्कन आई थीं। वालिद बहादुर ख़ान मुग़ल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीले के दरबार में मनसबदार यानी फ़ौजी अफ़सर थे। बाद में वो दिल्ली से हैदराबाद आ गए, जहां उनकी मुलाक़ात राजकुंवर से हुई और दोनों ने शादी कर ली।

चंदा बीबी को बचपन में ही महताब मां ने गोद ले लिया। जो हैदराबाद के वज़ीर-ए-आज़म नवाब रुक्नुद्दौला की पसंदीदा तवाइफ़ थीं। यही वो मोड़ था जहां चंदा के नसीब ने करवट ली। नवाब रुक्नुद्दौला न सिर्फ़ मह लक़ा से बेहद मोहब्बत करते थे, बल्कि उनकी तालीम-ओ-तरबियत में अपनी जानी दिलचस्पी भी रखते थे।

नतीजा ये हुआ कि चंदा बीबी को बेहतरीन उस्ताद, आला दर्जे के शायर, संगीतकार और अदब दान मुहैया कराए गए और यहीं से उनके अंदर का शायराना ज़हन खिलने लगा।

उस दौर की अदबी हवा और मह लक़ा की जगह

मह लक़ा बाई उस दौर में जी रहीं थीं जब उर्दू शायरी अपने इर्तिक़ा (evolution) के सबसे ख़ूबसूरत मरहलों से गुज़र रही थी। दिल्ली और लखनवी शायरी का रंग पूरे हिंदुस्तान में फैल रहा था। उनके समकालीन शायर कोई मामूली नाम नहीं बल्कि उर्दू अदब के आसमान के सितारे थे। मीर तक़ी मीर, मिर्ज़ा रफ़ी सौदा और ख़्वाजा मीर दर्द

मह लक़ा बाई की शायरी में इन्हीं उस्तादों की नफ़ासत और दक्कनी शायरी की नरमी घुलती गई। उनकी ग़ज़लें हुस्न-ओ-इश्क़, जज़्बात, नज़ाकत, दर्द और महीन इशारों की ऐसी दुनिया थीं जहां हर शेर एक नई महक लिए हुए था।

“गुलज़ार-ए-मह लक़ा”- उर्दू अदब की पहली ख़ातून का दीवान

उर्दू की पहली शायरा जिनका एक मुकम्मल दीवान मौजूद है ये एजाज़ मह लक़ा चंदा बाई के नाम है। उनका पहला दीवान “गुलज़ार-ए-मह लक़ा” उनकी वफ़ात के बाद 1824 में छपा। इसमें 39 ग़ज़लें शामिल हैं, और हर ग़ज़ल में 5 अशआर का वज़न और लय का ख़ास ख़्याल रखा गया। उनका दूसरा और ज़्यादा बड़ा मजमूआ है दीवान-ए-चंदा। जिसे उन्होंने 1798 में खुद मुरत्तिब किया और ख़ुद अपने हाथ से लिखवाया भी। इसमें 125 ग़ज़लें मौजूद हैं। उस दौर में एक तवाइफ़, एक लड़की, एक शायरा… और वो भी इतनी पढ़ी-लिखी कि अपना मजमूआ ख़ुद तैयार कर रही हो। ये सिर्फ़ फ़न नहीं, बल्कि एक क़ाबिल और आज़ाद-ख़याल औरत की पहचान है।

मह लक़ा बाई की यही ख़ूबी उन्हें हिंदुस्तान की पहली woman intellectual की कतार में भी ला खड़ा करती है।

कप्तान मैलकम को दी गई वो ‘Signed Copy’

“दीवान-ए-चंदा” का एक बेहतरीन नुस्ख़ा, जिसे मह लक़ा बाई ने 18 अक्टूबर 1799 को अपने हाथों से कैप्टन मैलकम को तोहफ़े में दिया था, आज ब्रिटिश म्यूज़ियम में महफ़ूज़ है। उस रात मह लक़ा बाई ने एक मशहूर रक़्स परफॉर्मेंस दी थी, और इसी महफ़िल में यह दीवान उन्हें पेश किया गया।

ये वाक़्या सिर्फ़ एक किताब देने का नहीं, बल्कि उस जमाने में एक भारतीय, मुस्लिम, महिला शायरा का एक अंग्रेज़ी अफ़सर को अपने फ़न का एतराफ़ कराना। एक बड़ी बात थी।

मह लक़ा की शायरी: हुस्न, इश्क़, दर्द और ख़ुद्दारी का संगम

मह लक़ा की ग़ज़लें सिर्फ़ इश्क़ की बातें नहीं करतीं, बल्कि औरत की अपनी आवाज़ भी बनकर उभरती हैं। वो अपने दर्द को छिपाती नहीं, बयान करती हैं और यही उनका फ़न है। 

उनके कुछ मशहूर अशआर:

गुल के होने की तवक़्क़ो पे जिए बैठी है,
हर कली जान को मुट्ठी में लिए बैठी है

मह लक़ा चंदा

इस शेर में इंतज़ार का दर्द और मोहब्बत की बेचैनी दोनों हैं।

कभी सय्याद का खटका है, कभी ख़ौफ़-ए-ख़िज़ां,
बुलबुल अब जान हथेली पे लिए बैठी है

मह लक़ा चंदा

यहां मह लक़ा ने ज़िंदगी की अनिश्चितता को बुलबुल की खौफ़ज़दा हालात से जोड़ दिया।

तीर ओ तलवार से बढ़ कर है तिरी तिरछी निगह,
सैकड़ों आशिक़ों का ख़ून किए बैठी है

मह लक़ा चंदा

ये इश्क़ की शिद्दत और आशिक़ के दिल का ख़ून होने जैसा दर्द दोनों बयां करता है। उनकी शायरी में दर्द-ए-दिल, रक़्स-ए-हुस्न, रंग-ए-तहज़ीब, और दिलकश इशारे साफ महसूस होते हैं।

सियासत, समाज और मह लक़ा: एक असरदार शख़्सियत

मह लक़ा बाई को अक्सर सिर्फ़ “शायरा” या “तवाइफ़” के दायरे में बांध दिया जाता है, जबकि उनकी शख़्सियत इससे कहीं व्यापक और असर अंदाज़ थी। वो हैदराबाद दरबार की एक ताक़तवर और मआरूफ़ हस्ती थीं, जिनके पास 30 लाख रुपये से ज़्यादा की जायदाद, ख़ूबसूरत महल, नौकर, काफ़िले और रक़्स-ओ-संगीत की शानदार महफ़िलों का पूरा इंतज़ाम होता था। 

मुतवल्ली होने के नाते उनके पास न सिर्फ़ मालिकाना हक़ था, बल्कि अहम फ़ैसलों में भी उनका प्रभावी दख़ल रहता था। उन्होंने वक़्फ़ की इमारतों, मस्जिदों और तालाबों की तामीर करवाई और ख़ासतौर पर औरतों की तालीम, उनकी तरक़्क़ी के लिए बेइंतहा जागरूक और सक्रिय रहीं।

उस दौर में एक ख़ातून का इतने सामाजिक और सियासी कामों में शामिल होना बहुत बड़ी बात थी।

महलक़ा बाई की महफ़िलें सिर्फ़ रक़्स-ओ-संगीत का रंग नहीं बिखेरती थीं, बल्कि अदब और फ़न की सबसे नफ़ीस जमाअत मानी जाती थीं। मीर दोस्त, मीर आलम और फ़क़ीरुल्लाह जैसे नामवर अदीब उनकी बैठकों की रौनक बढ़ाते। उनके घर में शायरी की बाज़ियां, ग़ज़ल-गोई, संगीत के खुशनुमा समारोह, फ़लसफ़े पर गहरी गुफ़्तगू और अदबी नफ़ासत। ये सब एक ही छत के नीचे बेहतरीन अंदाज़ में घुलते-मिलते थे। 

1824 में उनकी वफ़ात तो हो गई, मगर उसी साल उनका दीवान दुनिया के सामने आया और तब से महलक़ा बाई उर्दू अदब की सबसे अहम और मुकम्मल महिला शायराओं में शुमार होती हैं। दरअसल, महलक़ा सिर्फ़ एक तवाइफ़ या शायरा नहीं थीं। वो एक दौर की नुमाइंदा, एक तहज़ीब की आवाज़ और एक ख़्वाब की तरह थीं, जो उर्दू अदब को आज भी महकाता है। उनकी शायरी में नफ़ासत, तड़प, सच्चाई और सबसे बढ़कर एक आज़ाद और ख़ुद-आगाह औरत का एहसास है और यही एहसास उन्हें उर्दू की पहली और सबसे रोशन ख़ातून-ए-शायरा बनाता है।

ये भी पढ़ें: अब्दुल मन्नान समदी: रूहानी एहसास और अदबी फ़िक्र का संगम

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