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आमिर अज़हर: वो आवाज़ जो अल्फ़ाज़ को ज़िन्दा कर देती है, कहते हैं कुछ रास्ते मंज़िल नहीं बताते…

उर्दू अदब की दुनिया में कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं जो सिर्फ़ सुनाई नहीं देतीं, बल्कि दिल के गहराई में उतर जाती हैं। आमिर अज़हर उन्हीं में से एक हैं  एक ऐसी नर्म, असरदार और जज़्बाती आवाज़, जिसने न सिर्फ़ शायरी को नई ज़बान दी है बल्कि सुनने के अंदाज़ को भी एक नया रंग बख़्शा है।

29 दिसंबर 1989 को मध्य प्रदेश के तारीख़ी शहर भोपाल में पैदा हुए आमिर अज़हर का बचपन भी कुछ अलग-सा था। भोपाल, जिसे कभी ‘दार-उल-कमाल’ कहा जाता था, अपनी तहज़ीब, अदब और इल्म के लिए मशहूर रहा है। शायद इसी ज़मीन की मिट्टी में वो नर्मी और नफ़ासत थी,जो आमिर की आवाज़ में महसूस होती है।

आमिर की इब्तिदाई तालीम (प्रारंभिक शिक्षा) सऊदी अरब के ताइफ़ शहर में हुई, जहां उन्होंने इंटरनेशनल इंडियन स्कूल से अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी की। वहां के माहौल ने उनमें एक ग़ैर-मामूली शऊर और दुनिया को समझने की नई निगाह पैदा की। यही निगाह आगे चलकर उनकी आवाज़ और शायरी दोनों में झलकने लगी। डॉक्टर बनने का ख़्वाब लेकर उन्होंने पीपुल्स डेंटल कॉलेज, भोपाल से बतौर डेंटिस्ट ग्रेजुएशन किया। लेकिन शायद ज़िन्दगी को कुछ और ही मंज़ूर था। वो कहते हैं न 

‘कुछ रास्ते मंज़िल नहीं बताते
बल्कि मंज़िल ख़ुद रास्ते से मिलती है।’

आमिर अज़हर

आमिर का भी सफ़र कुछ ऐसा ही था। दंत-चिकित्सा से निकलकर उन्होंने तारीख़ (History) की तरफ़ रुख किया और सैफ़िया कॉलेज, भोपाल से मास्टर्स किया। आज वो इसी विषय पर पी.एच.डी. कर रहे हैं। पर इस सफ़र के बीच वो पहचान बने अपनी ‘आवाज़’ से।

आवाज़ की दुनिया में आमिर का सफ़र

ज़्यादातर लोग अपनी बात कहने के लिए अल्फ़ाज़ तलाश करते हैं, मगर आमिर वो हैं जिनके अल्फ़ाज़ खुद आवाज़ तलाश करते हैं। बहुत कम वक़्त में उन्होंने बतौर वॉइस आर्टिस्ट (Voice Artist) अपनी अलग पहचान बना ली। उनकी पढ़ने की रवानी, लफ़्ज़ों की तहज़ीब और अल्फ़ाज़ पर क़ाबू ने सुनने वालों को मोह लिया।

उनका पाॅडकास्ट चैनल ‘उर्दूदान’ आज एक जाना-माना नाम है। बहुत कम वक्त में ही इस चैनल अपने पहचान के साथ लोगों को जोड़ लिया। यहां वो उर्दू अदब, शायरी,अफ़साने और तज़करे इस अंदाज़ में पेश करते हैं कि लगता है जैसे कोई दोस्त देर रात दिल की बात सुना रहा हो। आमिर की आवाज़ में एक नर्म गर्मजोशी है जो ग़ालिब के अशआर को भी आज के दौर में ज़िन्दा कर देती है। यही वजह है कि लोग उनके एपिसोड सिर्फ़ सुनते नहीं, महसूस करते हैं।

‘रेख़्ता’ से रिश्ता

उर्दू अदब की सबसे मारूफ़ वेबसाइट ‘रेख़्ता’ आज उर्दू लवर्स के लिए एक खज़ाना है। आमिर अज़हर ने इस प्लेटफ़ॉर्म के साथ बतौर वॉइस आर्टिस्ट काम किया और कई नामवर शायरों की शायरी को अपनी दमदार आवाज़ में पढ़ा। उनकी आवाज़ में जब मीर, ग़ालिब, फ़ैज़ या फ़िराक़ के शेर गूंजते हैं, तो लगता है जैसे पुराने ज़माने की महफ़िलें फिर से आबाद हो गई हों। उन्होंने सिर्फ़ अशआर को पढ़ा नहीं, बल्कि उन्हें ‘जिया’ है।

शायरी: दिल की ज़बान

आमिर अज़हर सिर्फ़ एक वॉइस आर्टिस्ट नहीं, बल्कि एक शायर भी हैं। और उनकी शायरी में एक अलग ही तासीर है  नयापन, सादगी और एहसास की गहराई। वो कहते हैं:

‘पढ़ लेगा कोई रात की रोई हुई आंखें
हर सम्त हैं आराम से सोई हुई आंखें’

आमिर अज़हर

ये शेर सिर्फ़ तसव्वुर नहीं, बल्कि एक तस्वीर है  थके हुए दौर, बेचैन दिलों और सुकून की तलाश में निकले इंसान की तस्वीर। एक और ग़ज़ल में वो लिखते हैं:

‘हम पे लाज़िम था पहुंचना सो यहां तक पहुंचे
शौक़ रुकता ही नहीं चाहे जहां तक पहुंचे’

आमिर अज़हर

इन अशआर में ‘शौक़’ सिर्फ़ इश्क़ का नहीं, बल्कि मेहनत, लगन और हुनर का भी है जो रुकना नहीं जानता। उनकी शायरी में रिवायत (परंपरा) भी है और जदीदियत (आधुनिकता) भी। वो पुराने अल्फ़ाज़ में नए एहसास भर देते हैं।

‘इस तरह लिपटती है उदासी कि ये सोचें
दो पल की ख़ुशी का जो गुमां था तो कहां था’

आमिर अज़हर

ऐसे शेर सुनकर लगता है कि उदासी भी अब एक लम्हा बनकर मुस्कुरा रही है।

आवाज़ जो एहसास बन गई

आमिर अज़हर की सबसे बड़ी खूबी ये है कि वो सिर्फ़ “पढ़ते” नहीं  महसूस कराते हैं। उनकी आवाज़ में तिलावत की मिठास, सूफ़ियाना लहजा और अदबी ठहराव तीनों मौजूद हैं। यही वजह है कि उनके श्रोता सिर्फ़ उर्दू के दीवाने नहीं, बल्कि हर ज़ुबान के लोग हैं जो लफ़्ज़ों की ख़ुशबू को महसूस करना जानते हैं। उनकी आवाज़ का असर ये है कि शायरी सुनने वाले लोग अब उसे “देख” भी सकते हैं  जैसे कोई तस्वीर आंखों के सामने बन रही हो।

आमिर अज़हर का पॉडकास्ट चैनल ‘उर्दूदान’ दरअसल सिर्फ़ एक ऑडियो प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि एक तहरीक (movement) है  उर्दू को सुनाने, समझाने और उससे मोहब्बत करने की तहरीक। उनके हर एपिसोड में उर्दू की वह नर्मी, तहज़ीब और लय महसूस होती है जो इस ज़बान को दूसरों से जुदा करती है।

उनका मक़सद सिर्फ़ शायरी पढ़ना नहीं, बल्कि लोगों को यह एहसास दिलाना है कि उर्दू ज़बान सिर्फ़ लफ़्ज़ नहीं, एक जज़्बा है  मोहब्बत, अदब और इंसानियत का जज़्बा।

अदबी दुनिया में नई आवाज़

आज जब सोशल मीडिया पर शोर बहुत है, तो आमिर अज़हर जैसी आवाज़ें सुकून का समुंदर लगती हैं। उनकी शायरी में एक तरफ़ रूहानियत है, तो दूसरी तरफ़ हक़ीक़त की गर्मी।

‘ला-मकां से जो चले कौन-ओ-मकां तक पहुंचे
बे-करानी से गए हद्द-ए-गुमां तक पहुंचे’

आमिर अज़हर

ये शेर उनके पूरे सफ़र का रूपक है  जहां उन्होंने सऊदी अरब से लेकर भोपाल तक, डेंटिस्ट्री से लेकर अदब तक, और पढ़ाई से लेकर पॉडकास्ट तक एक पूरा सफ़र तय किया है। आमिर अज़हर आज उन नौजवान उर्दू आवाज़ों में हैं जो इस ज़ुबान को नई पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं  डिजिटल दुनिया में, पॉडकास्ट पर, और दिलों की गहराई में। आमिर अज़हर की कहानी एक ऐसे शख़्स की कहानी है जिसने अपनी पहचान आवाज़ से बनाई, अपने जज़्बे से निभाई और अपने हुनर से निखारी।

वो उन लोगों में से हैं जो ‘सुनाने’ को इबादत समझते हैं, और ‘अल्फ़ाज़’ को अमानत। उनका सफ़र अभी जारी है और शायद आगे आने वाले वक़्त में जब कोई शख़्स उर्दू अदब की नई आवाज़ों का ज़िक्र करेगा, तो आमिर अज़हर का नाम ज़रूर आएगा। क्योंकि कुछ आवाज़ें वक़्त से आगे चली जाती हैं  और आमिर की आवाज़ उन्हीं में से एक है।

ये भी पढ़ें: शकेब जलाली: जिनकी ज़िन्दगी अधूरी ग़ज़ल थी लेकिन लफ़्ज़ एहसास बनकर उतरे 

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