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Banana Boy Gopal Jee : खेतों से लैब तक, भारत के युवा वैज्ञानिक का सफ़र

अगर आप Google पर Youngest Scientist of India सर्च करेंगे, तो सबसे ऊपर जिस नाम के साथ देश का परिचय होता है, वो है बिहार के युवा वैज्ञानिक Gopal Jee। पूरी दुनिया उन्हें “Banana Boy” के नाम से जानती है। उनकी पहचान सिर्फ़ नाम तक सीमित नहीं है, बल्कि ये उस सफ़र की कहानी है जिसमें एक साधारण किसान परिवार का बेटा अपने अद्भुत इंवेंशन से दुनिया को चौंका देता है।

कम उम्र में ही Gopal Jee ने ऐसे आविष्कार किए, जिनकी कल्पना बड़ी उम्र के अनुभवी वैज्ञानिक भी नहीं कर पाते। आज वो सिंगल-यूज़ प्लास्टिक को ख़त्म करने के लिए केले के एग्री-वेस्ट से उपयोगी और टिकाऊ प्रोडक्ट बना रहे हैं।

प्लास्टिक का संकट और गोपाल जी का समाधान

प्लास्टिक आज पूरी दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है। ये पर्यावरण को धीरे-धीरे ज़हर की तरह निगल रही है। बाज़ार में प्लास्टिक के विकल्प तलाशने के लिए कई रिसर्च हुए, लेकिन अभी तक कोई सस्टेनेबल और किफ़ायती विकल्प नहीं आया। Gopal Jee कहते हैं, “लोग तभी प्लास्टिक का इस्तेमाल छोड़ेंगे, जब उन्हें उसी दाम या उससे भी कम दाम में वैसा ही मज़बूत और टिकाऊ विकल्प मिलेगा।”

इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए उन्होंने पिछले 6–7 सालों से लगातार काम किया है। पिछले चार साल से वो कॉर्पोरेट सेक्टर से जुड़े हुए हैं और रिसर्च को आगे बढ़ा रहे हैं। उनकी मेहनत का नतीजा ये है कि लैब-लेवल पर उन्हें सफलता मिल चुकी है। अब तक उन्होंने बोतल, गिलास और थर्माकोल जैसी चीजों के विकल्प तैयार किए हैं।

केले के वेस्ट का सही उपयोग

फिलहाल ये प्रोजेक्ट लैब स्केल पर है। अब Gopal Jee अपने निवेशकों और सहयोगियों के साथ मिलकर इसे बड़े स्तर पर ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। अगले चरण में POP (Proof of Plant) तैयार किया जाएगा, उसके बाद प्रोडक्शन शुरू कर इसे बाज़ार में लाया जाएगा। इस इनोवेशन का मकसद दोहरा है लोगों की ज़िंदगी आसान बनाना और किसानों की आय बढ़ाना है।

इस प्रक्रिया में केले के बचे हुए हिस्से को पल्प में बदला जाता है। यही पल्प फिर इंजेक्शन मोल्डिंग या पेपर-मेकिंग प्रोसेस में काम आता है और अलग-अलग उत्पाद बनते हैं। ये पूरी प्रक्रिया Gopal Jee ने खुद विकसित की है।

केले के पेड़ से इलेक्ट्रिसिटी

केले के पेड़ से बिजली बनाने का सफ़र Gopal Jee के लिए एक इत्तेफ़ाक़ से शुरू हुआ, लेकिन आगे चलकर यह उनकी ज़िंदगी की दिशा बन गया। उनके टीचर ने एक बार कहा था, कि “साइंस सिर्फ़ पढ़ने तक सीमित नहीं, बल्कि जीने की चीज़ है।” यही सोच उनके भीतर गहराई तक उतर गई।

बचपन में पिता के साथ केले की खेती करते हुए उन्होंने देखा कि फसल कटने के बाद खेतों में बचा हुआ कचरा किसी काम का नहीं होता। साल 2008 में आई बाढ़ ने हालात और गंभीर कर दिए, पूरी फसल बर्बाद हो गई और किसानों की मेहनत डूब गई।

तभी उन्होंने फैसला किया कि वो ऐसा इनोवेशन करेंगे जिससे ये बेकार वेस्ट किसानों के लिए कमाई का साधन बने। एक बार केले के वेस्ट का तरल (Liquid) उनके कपड़ों पर गिरा और उसका दाग कभी नहीं गया। ये घटना उनके भीतर सवाल छोड़ गई। नौवीं कक्षा की लैब में जब वो इलेक्ट्रोलाइट्स की पढ़ाई की, तो उन्होंने सोचा क्यों न इसे केले के पेड़ पर आज़माया जाए।

नतीजा चौंकाने वाला था, पेड़ से बिजली पैदा हुई। ये उनकी पहली बड़ी खोज थी, जिसे उन्होंने शिक्षक को दिखाया और भारत सरकार के Inspire Award तक पहुंचाया। इस उपलब्धि के लिए उन्हें सम्मान के साथ 10,000 रुपये का पुरस्कार भी मिला।

नासा को ठुकराया, देश चुना

आज वही छोटे-छोटे प्रयोग Gopal Jee को विज्ञान की दुनिया में एक नई पहचान दे चुके हैं। वो बतौर चीफ़ साइंटिस्ट काम कर रहे हैं और अब तक 49–50 आविष्कार कर चुके हैं। इनमें से कई ऐसे हैं जो आने वाले समय में किसानों, आम जनता और पर्यावरण के लिए वरदान साबित होंगे। देहरादून में काम करते हुए उन्होंने NASA को भी अपने रिसर्च थ्योरी भेजी।

नासा की ओर से उन्हे तीन बार काम करने का मौक़ा मिला लेकिन उन्होंने भारत में रहकर अपने इनोवेशन को आगे बढ़ाना चुना। उनका मानना है कि भारत के युवाओं को प्रेरणा देना और अपने देश के लिए काम करना ही असली उपलब्धि है।

भारत की शिक्षा व्यवस्था और संघर्ष

Gopal Jee का मानना है कि भारत जैसे देश में शिक्षा व्यवस्था बहुत कॉम्पिटिटिव है। IIT या बड़े संस्थानों में प्रवेश के लिए परीक्षाएं और प्रतियोगिताएं पास करनी होती हैं। लेकिन अगर किसी स्टूडेंट के पास इनोवेशन या रिसर्च के आइडिया हैं, तो उसके लिए कोई सीधी व्यवस्था नहीं है। वो कहते हैं कि, “अगर आपके पास अच्छे मार्क्स हैं तो स्कॉलरशिप पर एडमिशन मिल जाता है।

लेकिन अगर आपके पास नए आइडिया और अविष्कार हैं, नेशनल लेवल के अवॉर्ड्स के बावजूद तो भी कोई संस्था आपको लैब या सुविधा उपलब्ध नहीं कराती।” यही समस्या उन्होंने खुद झेली। उन्होंने कई संस्थानों को पत्र और ईमेल भेजे, लेकिन जवाब नहीं मिला। तब वे दिल्ली स्थित पीएमओ ऑफिस गए और लगातार प्रयास के बाद उन्हें मौका मिला कि वो अपने प्रोजेक्ट दिखा सकें।

पहली लैब और आगे का सफ़र

पीएमओ ने उन्हें लैब उपलब्ध कराने का ऑफर दिया, लेकिन आर्थिक स्थिति के कारण वो उस समय नहीं जा सके। बाद में उन्हें देहरादून की एक यूनिवर्सिटी में स्कॉलरशिप के साथ लैब का मौक़ा मिला। यहां उन्होंने तीन साल तक Banana Nanocrystals और Banana Nanofiber पर काम किया। इस दौरान उन्होंने अपने इनोवेशन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया और प्रैक्टिकल स्तर पर उत्पाद विकसित करने का अनुभव हासिल किया।

YMRD संस्था की स्थापना

Gopal Jee ने देखा कि देश में हजारों बच्चे ऐसे हैं जिनके पास बेहतरीन आइडिया होते हैं, लेकिन उनके पास सुविधा नहीं होती। प्रतियोगिताओं में उनके आइडिया आते हैं, लेकिन वहां ख़त्म हो जाते हैं। इसी सोच के साथ उन्होंने 2018 में Young Mind Research and Development संस्था की स्थापना की। ये संस्था बच्चों को इनोवेशन, रिसर्च, पेटेंट, पेपर राइटिंग और इंटरनेशनल स्तर तक पहुंचाने में मदद करती है। यहां बच्चों को लैब, फंडिंग और रिसोर्सेस उपलब्ध कराए जाते हैं।

पिछले साल Young Mind Research and Development Foundation की टीम को NASA के अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का मौका मिला। दुनिया की 72 टीमों में से भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए सिर्फ़ YMRD NGO को चुना गया। हालांकि वो गोल्ड मेडल नहीं जीत पाए, लेकिन भारत के लिए ये गर्व का पल था। Gopal Jee का सपना है कि आने वाले सालों में भारत इस प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीते।

नई स्कॉलरशिप और बच्चों का भविष्य

Gopal Jee की संस्था अब एक नई स्कॉलरशिप शुरू कर रही है। इसके तहत बच्चों को 10 लाख तक का रिसर्च फंड दिया जाएगा। इनोवेशन करने पर स्टार्टअप फंड मिलेगा, इंडस्ट्रियल लैब, फैसिलिटी, एलआर, इंटर्नशिप और एक साल की पढ़ाई की फीस भी संस्था देगी। ये संस्था बच्चों से कोई फ़ीस नहीं लेगी। Gopal Jee मानते हैं कि आर्थिक स्थिति चुनौतियां तो देती है, लेकिन असली संघर्ष आत्मविश्वास का होता है।

सबसे पहले खुद पर भरोसा करना ज़रूरी है। समाज के तयशुदा रास्तों से हटकर कुछ करना आसान नहीं होता। Gopal Jee को 2013-14 में Inspire Award मिला था। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार उनके नाम हैं। उनका मानना है कि पुरस्कार छोटे-बड़े नहीं होते, वो सिर्फ़ आपके काम की सराहना होते हैं और आपको दस गुना ताकत देते हैं।

भविष्य का सपना

आगे की योजना पर वो कहते हैं कि, “मेरा सबसे बड़ा सपना एक रिसर्च सेंटर बनाना है, जहां देशभर के हजारों युवा वैज्ञानिक और शोधकर्ता मिलकर काम करें। हम ऐसा माहौल बनाना चाहते हैं, जहां विज्ञान और इनोवेशन को उसी ऊंचाई पर ले जाया जाए, जिसका सपना हमारे पूर्वजों ने देखा था।” उनका लक्ष्य है कि आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसा भारत मिले, जहां साइंस और रिसर्च विकास की असली ताक़त बने।

ये भी पढ़ें: Pankaj Kumar की कहानी: फुटपाथ से ‘Oxygen Man’ बनने तक का सफ़र

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