हज़रत निजामुद्दीन औलिया के 721वें उर्स के मौक़े पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर के अक़ीदतमंदों को मुबारकबाद पेश की। प्रधानमंत्री ने इस मौके़ पर हज़रत निजामुद्दीन औलिया की तालीमयात को आज के समय में भी बेहद उम्दा बताया। प्रधानमंत्री ने कहा, “उर्स मुबारक, हज़रत निजामुद्दीन के अक़ीदत मंदों के लिए उनकी ज़िंदगी और पैग़ाम पर विचार करने का सुनहरा अवसर है। उनका जीवन आज भी प्रेरणा का स्रोत है और उनकी शिक्षाएं समाज को सही दिशा देने का काम कर रही हैं।”
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प्रधानमंत्री मोदी ने सूफी संतों की शिक्षाओं पर ज़ोर देते हुए कहा कि हज़रत निजामुद्दीन औलिया का योगदान समाज में एकता, शांति और भाईचारे को बढ़ावा देने वाला रहा है। उन्होंने बताया कि सूफ़ी संतों ने हमेशा मानवता, प्रेम और शांति का संदेश दिया है। उनकी शिक्षाएं धर्मों और विचारधाराओं के बीच पुल बनाने का काम करती हैं। हज़रत निजामुद्दीन औलिया का जीवन पूरी तरह से मानवता की सेवा के लिए समर्पित रहा। उन्होंने जीवनभर सामाजिक और सांस्कृतिक सीमाओं को पार करके लोगों को एकजुट किया। उनके जीवन के कई पहलू, जैसे संगीत, साहित्य और दर्शन, आज भी युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बने हुए हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि हज़रत निजामुद्दीन औलिया की शिक्षाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी वे पहले थीं। उन्होंने कहा कि उनका जीवन समर्पण, सेवा और मानवता की भलाई के लिए था। हज़रत निजामुद्दीन औलिया ने समाज को प्रेम, एकता और शांति का पाठ पढ़ाया। उनके जीवन की यही विशेषताएं हमें एक समावेशी और एकजुट समाज बनाने की प्रेरणा देती हैं।हज़रत निजामुद्दीन औलिया का जन्म 1238 में उत्तर प्रदेश के बदायूं में हुआ था। वे चिश्ती संप्रदाय के एक प्रमुख सूफी संत थे और उन्होंने दिल्ली में इस संप्रदाय के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके सबसे प्रसिद्ध शिष्य अमीर खुसरो थे, जिन्होंने साहित्य और संगीत में अद्वितीय योगदान दिया।
प्रधानमंत्री मोदी ने हजरत निजामुद्दीन औलिया की शिक्षाओं को आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक बताया। उन्होंने कहा कि हज़रत निजामुद्दीन औलिया ने धर्म और जाति से परे मानवता की सेवा की और उनकी शिक्षाएं हमें एकता और सद्भाव की ओर ले जाने का संदेश देती रहेंगी।
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