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अज़हर नवाज़: वो आवाज़ जो ख़ामोशी से गूंजती है, वो कहते हैं ‘मिलते जुलते हैं यहां लोग ज़रूरत के लिए’…

उर्दू शायरी की दुनिया हमेशा से नई आवाज़ों, नए एहसासों और ताज़ा तर्ज़-ए-बयान की तलाश में रही है। यही तलाश कभी मीर तक़ी मीर तक जाती है, कभी ग़ालिब तक, और आज की पीढ़ी में ये सिलसिला अज़हर नवाज़ जैसे नौजवान शायरों तक आ पहुंचा है जो अपनी शायरी में सादगी, गहराई और समकालीन ज़िंदगी की झलक को बख़ूबी समेटते हैं।

 शुरुआती ज़िंदगी और तालीम

अज़हर नवाज़ की पैदाइश 18 जून 1995 को उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक शहर आज़मगढ़ में हुई। ये वो ज़मीन है जिसने शिबली नोमानी, कैफ़ी आज़मी और अली सरदार जाफ़री जैसे अदब के कई नामवर दिए। इसी मिट्टी से अज़हर ने अपनी पहचान का पहला नक़्श उकेरा।


मिलते जुलते हैं यहां लोग ज़रूरत के लिए
हम तिरे शहर में आए हैं मोहब्बत के लिए

वो भी आख़िर तिरी तारीफ़ में ही ख़र्च हुआ
मैं ने जो वक़्त निकाला था शिकायत के लिए

अज़हर नवाज़

उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया से अंग्रेज़ी में एम.ए किया और उसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से अंग्रेज़ी साहित्य में पीएचडी की। इस तालीमी सफ़र ने उनके अंदर सोच की गहराई, ज़बान की नफ़ासत और अहसास की परिपक्वता(पख़तग़ी) को और निखारा।

शायरी की शुरुआत

अज़हर नवाज़ का कहना है कि उन्होंने शायरी महज़ इज़हार का ज़रिया नहीं, बल्कि अपने अंदर की दुनिया को समझने के लिए शुरू की। वे बहुत संभलकर शे’र कहते हैं उनके लिए शायरी कोई जल्दबाज़ी नहीं, बल्कि एक तवक्कुफ़ है, एक ठहराव जहां हर लफ़्ज़ दिल से निकलकर काग़ज़ पर उतरता है।

उनकी शायरी की ज़बान सादा, मगर असरदार है। रवां बहरों और रोज़मर्रा की लफ़्ज़ियात से वे ऐसे अशआर गढ़ते हैं जिनमें आज के दौर की हक़ीक़त भी झलकती है और मोहब्बत की नर्मी भी महसूस होती है।

शायरी की ख़ासियत

अज़हर नवाज़ की शायरी में सबसे दिलचस्प बात ये है कि वो सीधी लगने वाली बातों में गहरी बातें कह जाते हैं। उनके कुछ शे’र ऐसे हैं जो एक बार पढ़ने पर सादे लगते हैं, लेकिन दोबारा पढ़ो तो मानी के कई दरवाज़े खुलते हैं।

“मुझ को हर सम्त ले के जाता है
एक इम्कान तेरे होने का।”

अज़हर नवाज़

सादगी से कहा गया ये शे’र मोहब्बत के उस एहसास को बयान करता है जो हर जगह, हर लम्हे किसी की मौजूदगी का अहसास कराता है भले वो शख़्स सामने न हो।

 एहसास और समाज का संगम

अज़हर नवाज़ सिर्फ़ रूमानी शायर नहीं हैं। उनकी शायरी में ज़माने की हक़ीक़त भी शुमार है इंसान के ग़ुस्से, कमज़ोरी, डर और इख़लाक़ी टकराव सब किसी न किसी शे’र में झलकते हैं।

“किसी बुज़दिल की सूरत घर से ये बाहर निकलता है,
मिरा ग़ुस्सा किसी कमज़ोर के ऊपर निकलता है।”

अज़हर नवाज़

ये शे’र हमारे समाज के उस सच्चे मगर कड़वे पहलू की तरफ़ इशारा करता है जहां ताक़तवर पर ग़ुस्सा करने की हिम्मत नहीं होती, और वही ग़ुस्सा किसी कमज़ोर पर उतर आता है।

रिश्तों और मोहब्बत की बात

अज़हर नवाज़ की शायरी में मोहब्बत महज़ इज़हार नहीं, बल्कि एक तहज़ीब की तरह मौजूद है। उनके यहां मोहब्बत में शिकवा भी है, वफ़ा भी, और एक नरम सी दार्शनिक सोच भी।

वो भी आख़िर तिरी तारीफ़ में ही ख़र्च हुआ,
मैं ने जो वक़्त निकाला था शिकायत के लिए।”

अज़हर नवाज़

यहां मोहब्बत की वो आदत नज़र आती है जहां शिकायत भी आख़िर में तारीफ़ बन जाती है क्योंकि दिल में नफ़रत की जगह मोहब्बत ही बचती है।

सादगी और नफ़ासत की ज़बान

उनकी ज़बान में कोई बनावट नहीं। रोज़मर्रा की लफ़्ज़ावली में ही वो मानी की नई गहराई पैदा कर देते हैं। उर्दू की रवां और मिठास से भरी ज़बान में वे आम इंसान के एहसास को बयान करते हैं।

“मिलते-जुलते हैं यहां लोग ज़रूरत के लिए,
हम तिरे शहर में आए हैं मोहब्बत के लिए।”

अज़हर नवाज़

ये शे’र हमारे दौर की सच्चाई पर हल्की मुस्कान के साथ चोट करता है जहां रिश्ते अकसर ज़रूरतों के साये में पलते हैं, पर अज़हर का शायर वहां मोहब्बत लेकर आता है।

अज़हर की सोच और अदबी जड़ें

अज़हर नवाज़ के पसंदीदा शायरों में मिर्ज़ा ग़ालिब, मीर तक़ी मीर, दाग़ देहलवी, इरफ़ान सिद्दीकी, शकेब जलाली, अहमद फ़राज़ और फ़रहत एहसास जैसे नाम शामिल हैं। इन उस्ताद शायरों ने उनकी सोच और लहजे पर गहरा असर डाला है, लेकिन उन्होंने अपने अंदाज़ को नकल नहीं बनने दिया। उनकी शायरी में पुरानी रवायत की ख़ुशबू है, लेकिन आधुनिक जज़्बात की ताज़गी भी मौजूद है।

अज़हर नवाज़ की प्रतिनिधि ग़ज़लें “क़ाफ़िला-ए-नौबहार” नाम के काव्य-संग्रह में शामिल की जा चुकी हैं, जिसे रेख़्ता ने प्रकाशित किया है।

ये किताब नई नस्ल के उन शायरों का मंज़र पेश करती है जो उर्दू अदब को 21वीं सदी की आवाज़ दे रहे हैं। अज़हर उनमें से एक मज़बूत और उम्मीद भरा नाम हैं, जो इस “नस्ल-ए-नौ” का चेहरा बनते जा रहे हैं।

जो मेरा झूट है अक्सर मिरे अंदर निकलता है,
जिसे कम-तर समझता हूं वही बेहतर निकलता है।”

अज़हर नवाज़

“चारासाज़ो मिरा इलाज करो,
आज कुछ दर्द में कमी सी है।”

अज़हर नवाज़

“मैं सितारा हूं मगर तेज़ नहीं चमकूंगा,
देखने वाले की आंखों की सुहूलत के लिए।”

अज़हर नवाज़

अज़हर नवाज़ की अहमियत

आज जब शायरी अकसर सोशल मीडिया के शोर में खो जाती है, अज़हर नवाज़ जैसे शायर हमें याद दिलाते हैं कि शायरी अभी भी दिल और दिमाग़ के बीच की पुल है। उनकी शायरी न तो पूरी तरह रिवायती है, न ही महज़ मॉडर्न बल्कि दोनों का एक खूबसूरत संगम है। वो उर्दू शायरी की उस रवायत को ज़िंदा रखे हुए हैं जिसमें एहसास की गहराई और ज़बान की नर्मी दोनों शामिल हैं।

अज़हर नवाज़ आज की उर्दू शायरी की उस आवाज़ का नाम हैं जो ख़ामोशी से गूंज पैदा करती है। उनकी शायरी में मोहब्बत भी है, तन्हाई भी, ज़िंदगी की तल्ख़ हक़ीक़तें भी हैं और उम्मीद की नर्म रोशनी भी। वे उर्दू के उस नए दौर के शायर हैं जो पुरानी रिवायत की इज़्ज़त करते हुए, अपने ज़माने की बात कहने से नहीं कतराते।

“मुझ को हर सम्त ले के जाता है,
एक इम्कान तेरे होने का।”

अज़हर नवाज़

ये शे’र जैसे उनकी पूरी शायरी का आईना है  उम्मीद, मोहब्बत और तलाश का। अज़हर नवाज़ की शायरी हमें यही सिखाती है कि शब्दों की सादगी में भी जज़्बात की गहराई छुपी हो सकती है।

ये भी पढ़ें: शकेब जलाली: जिनकी ज़िन्दगी अधूरी ग़ज़ल थी लेकिन लफ़्ज़ एहसास बनकर उतरे 

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