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मशहूर इतिहासकार प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब के साथ एक यादगार मुलाक़ात

तारीख़ थी 18 जून 2025 और सुबह के करीब साढ़े छह बजे जब DNN24 की हमारी टीम ने दिल्ली से अलीगढ़ की ओर रवाना हुई। सफ़र के दौरान दिल में एक ही ख़्वाहिश थी प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब साहब से मुलाक़ात हो जाए। चार घंटे का सफ़र तय कर हम ठीक साढ़े दस बजे अपनी मंज़िल पर पहुंचे तो लेकिन अब असली इम्तिहान शुरू हो रहा था। हबीब साहब से राब्ता कायम करने का कोई भी ज़रिया नहीं मिल पा रहा था। सच कहें तो, उस वक़्त हम काफ़ी मायूस हुए और एक अजीब सी बेबसी भी हम घिरते जा रहे थे। 

लेकिन ये मायूसी बस कुछ ही लम्हों के लिए थी। उस वक्त मुझे शाहरुख़ ख़ान की फ़िल्म का मशहूर डायलॉग याद आया  ‘अगर किसी चीज़ को दिल से चाहो तो सारी कायनात उसे तुमसे मिलाने में लग जाती है..’ और फिर दोस्तों, यक़ीन मानिए, कुछ ऐसा ही हुआ। ठीक उसी वक़्त हमारी मुलाक़ात अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के चीफ़ मेडिकल ऑफ़िसर डॉक्टर शारिक़ अक़ील साहब से हुई। उनसे हमारी गुफ़्तगू हुई और फिर मैं और डॉक्टर शारिक़ अक़ील अलीगढ़ के बदर बाग़ इलाके के लिए चल पड़े, जहां प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब साहब रहते हैं।

प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब की लाइब्रेरी

बदर बाग़ का आलीशान बंगला

जब हम उस आलीशान बंगले में दाख़िल हुए, तो ऐसा लगा जैसे वक़्त थम सा गया है। उस पुरानी इमारत में कदम रखते ही, तारीख़ की अनमोल यादें ताज़ा हो गई। अंदर, सायरा हबीब साहिबा बड़े इत्मीनान से अख़बार पढ़ रही थीं। हमने उन्हें अपने आने का मक़सद बताया, और उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान फैल गई और फिर, आख़िरकार, वो पल आ ही गया जिसका हमें बेसब्री से इंतज़ार था। हमारी मुलाक़ात प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब सर से हुई।

एक यादगार दास्तान 

प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब से हमारी एक बहुत ही ख़ूबसूरत और क़ीमती गुफ़्तगू हुई। हमने उनसे इंटरव्यू के लिए वक्त मांगा, और उन्होंने मुस्कुराते हुए हमें शाम के ठीक छह बजे का टाइम दिया। वक़्त की नज़ाकत को समझते हुए, हम तयशुदा वक़्त से कुछ पहले ही वहां पहुंच गए और फिर बातचीत का वो सिलसिला शुरू हुआ, जिसने हमारे मन पर गहरी छाप छोड़ दी। अलीगढ़ की वो सुबह, वो मुलाक़ातें, और वो शाम का इंटरव्यू… ये सब कुछ किसी हसीन दास्तान से कम नहीं था, जिसे हम ज़िंदगी भर नहीं भूल पाएंगे।

प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब के साथ बातचीत

प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब का घर: इतिहास का जीता-जागता नख़लिस्तान

अलीगढ़ के बदर बाग़ में, जहां आजकल हाई-राइज़ बिल्डिंग्स और नए-नए घर नज़र आते हैं, वहीं एक कोना ऐसा भी है जो अब भी पुराने वक़्त की ख़ुशबू समेटे हुए है। यही है प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब साहब का घर। एक सादा मगर बेहद ख़ास। ये सिर्फ़ एक मकान नहीं, बल्कि एक ऐसा ठिकाना है जहां इतिहास ज़िंदा महसूस होता है।

घर के साथ जुड़ा हुआ एक बड़ा बाग़ है, जो हरियाली से भरा हुआ है. जैसे ही दोपहर का सूरज बरामदे से अंदर झांकता है, पूरा बाग़ जैसे जाग उठता है। वहां तीन सुंदर मोर टहलते हुए नज़र आते हैं, पेड़ों से तोते चहचहाते हैं, और कभी-कभी एक कौए भी अपनी आवाज़ सुनने को मिलती है। सब कुछ बहुत सुकून भरा है। अलीगढ़ की वो दोपहर, बदर बाग़ की वो ख़ामोशी, और प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब साहब के साथ बिताए वो लम्हे। ये सब कुछ एक ख़ूबसूरत याद बनकर हमारे दिल में हमेशा के लिए बस गया। ये सिर्फ़ एक इंटरव्यू नहीं था, एक एहसास था अलीगढ़ की रूह को क़रीब से देखने और महसूस करने का।

अलीगढ़ का नाम और AMU का मक़सद: प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब से इल्मी बातें

हमारी बातचीत की शुरुआत तालीम और अलीगढ़ से इसके रूहानी रिश्ते पर हुई। जब हमने प्रोफ़ेसर साहब से पूछा कि ‘अलीगढ़’ नाम कैसे पड़ा? तो उन्होंने बड़े सादगी से जवाब दिया। कहा जाता है कि तारीख़ों में सनद (पुष्टि) मिलना मुश्किल है। 19वीं सदी से ये कहा गया कि ये नाम नजफ़ अली ख़ां के ऊपर पड़ा।

हमने प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब साहब से ये भी जानने की कोशिश की कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) की स्थापना के पीछे सर सैयद अहमद ख़ां का क्या मक़सद था। उन्होंने बताया कि सर सैयद अहमद ख़ां ने पहले मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल (MAO) कॉलेज की स्थापना की, और बाद में यही कॉलेज साल 1921 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) बन गया।

सर सैयद अहमद ख़ां ने अपनी तहरीरों (लेखों) में इस बात पर ज़ोर दिया था कि उस वक़्त के मुसलमानों में अंग्रेज़ी तालीम की कमी थी। इस वजह से वे अंग्रेज़ों की हुकूमत में तरक्की नहीं कर पा रहे थे और उन्हें कामयाबी नहीं मिल पा रही थी। इसी ख़ामी (कमी) को दूर करने के लिए सर सैयद अहमद ख़ां ने एक ऐसे कॉलेज की बुनियाद (नींव) रखी, जहां मुसलमानों को आधुनिक और अंग्रेज़ी शिक्षा दी जा सके।

प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब DNN24 Journalist Saboor Ali के साथ घर के आंगन में पुरानी यादें ताज़ा करते हुए

फ़ारसी और ‘तरकश’ का ज़िक्र

सूरज अब धीरे-धीरे रात के आगोश में आ रहा था। जब हमने इरफ़ान साहब से उनकी लाइब्रेरी देखने की दरख़्वास्त की।  सच कहूं तो, उन्होंने हमारी ये फ़रमाईश पूरी कर दी।  जैसे ही हम उस अदबी ख़ज़ाने में दाख़िल हुए, हमारी निगाहें बस जहां-तहां किताबों को ही ढूंढ रही थीं। हर तरफ़ किताबों का सैलाब था, और हर किताब अपनी एक कहानी बयां कर रही थी। किताबों से भरी अलमारियों के बीच इरफ़ान सर से बातचीत का सिलसिला जारी था।

बातचीत के दौरान इरफ़ान हबीब साहब ने फ़ारसी ज़ुबान का ज़िक्र किया।  उनके लहजे में एक उदासी थी, जब उन्होंने कहा कि अब फ़ारसी को पढ़ने वाले बहुत कम रह गए हैं. उन्होंने ‘तरकश’ का ज़िक्र किया, जो असल में फ़ारसी अदब, ख़ासकर शायरी, ख़ुतूत (ख़तों), तज़किरा (जीवनी), और दास्तानगोई (किस्सागोई) में इस्तेमाल होने वाला एक ख़ास अंदाज़ था। यानी, हर लफ़्ज़ का एक गहरा मतलब, और हर जुमले में कई परतें होती थीं, जैसे तीर से भरा तरकश, हर तीर निशाने पर. हमारी गुफ़्तगू इतनी दिलचस्प हो रही थी कि हमें वक़्त का पता ही नहीं चला और शाम ढलती गई।

घर और पैदाइश: एक ही साल का इत्तेफ़ाक़

इरफ़ान साहब ने एक और दिलचस्प बात बताई। उन्होंने कहा कि ये घर और उनकी पैदाइश (जन्म) दोनों हमउम्र हैं  यानी दोनों का जन्म एक ही साल में हुआ। साल 1931 में, ब्रिटिश की एक फ़र्म ने ये घर और यूनिवर्सिटी में एक लैब बनाई थी। घर के बाहर एक मारुति कार और एक बाइक खड़ी थी, जो उनकी सादगी का आईना है।

हम टहलते-टहलते बातें करते रहे, और वक़्त कैसे पंख लगाकर उड़ गया, पता ही नहीं चला। सर की सादगी को सलाम है कि उन्होंने हमें अलविदा कहने के लिए बाक़ायदा गेट तक आकर छोड़ा। आप जल्द ही प्रो. इरफ़ान हबीब साहब के साथ हमारी इस ख़ूबसूरत बातचीत का सिलसिला सिर्फ़ DNN24 पर देख पाएंगे। ये एक ऐसी मुलाक़ात थी जो सिर्फ़ एक इंटरव्यू नहीं, बल्कि इल्म और यादों से भरी एक दिलचस्प दास्तान रही।

ये भी पढ़ें: कैसे सर सैयद अहमद ख़ान ने देश की टॉप यूनिवर्सिटी क़ायम की? चंदे के लिए घूघंरू बांध नाचना भी पड़ा

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