26-Feb-2025
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दिल्ली की दूसरी मिनी कुतुब मीनार: इतिहास के पन्नों में छुपी एक धरोहर

ये जगह कभी जंगल से घिरी हुई थी, जहां मुगल शासकों के हाथियों का बसेरा हुआ करता था।

दिल्ली में मौजूद कुतुब मीनार के बारे में लगभग हर कोई जानता है, जिसका निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने करवाया था। लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि दिल्ली में एक और कुतुबमीनार भी है, जिसे ‘मिनी कुतुब मीनार’ या ‘हस्तसाल मीनार’ के नाम से जाना जाता है। ये वेस्ट दिल्ली के उत्तम नगर के हस्तसाल गांव में मौजूद है। इसकी बनावट महरौली के कुतुब मीनार से काफी मिलती-जुलती है, इसलिए इसे मिनी कुतुब मीनार कहा जाता है।

मिनी कुतुब मीनार का इतिहास

इस मीनार के निर्माण को लेकर इतिहासकारों के अलग-अलग मत या राय हैं। कुछ एक्सपर्ट मानते हैं कि इसे 16वीं या 17वीं शताब्दी में मुगल सम्राट शाहजहां ने बनवाया था। ऐसा कहा जाता है कि शाहजहां ने इसे अपनी शिकारगाह के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए बनवाया था। जंगल में शिकार करने के बाद वो इस मीनार पर आकर विश्राम करते थे। वहीं, कुछ लोगों का मानना हैं कि इस मीनार का निर्माण पृथ्वीराज चौहान के समय में हुआ था। वहीं यहां के स्थानीय लोगों की अपनी अलग राय हैं।

मिनी कुतुब मीनार की बनावट

ये मीनार लाल बलुआ पत्थर से बनी है, जो इसे कुतुबमीनार के समान बनाती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इसमें सीढ़ियां हैं, जो ऊपर तक जाती थीं। पुराने समय में यह मीनार पांच मंजिलों की थी, लेकिन अब केवल तीन मंजिलें ही बची हैं। कहा जाता है कि 18वीं सदी में इसकी दो ऊपरी मंजिलें ढह गई थीं। पहले इसके ऊपर एक गुंबददार छतरी भी थी, जो अब ढह चुकी है।

स्थानीय लोगों की राय

हस्तसाल गांव के निवासी इस ऐतिहासिक धरोहर को लेकर अलग-अलग कहानियां बताते हैं। यहां के लोकल आशु वाल्मीकि के अनुसार, मिनी कुतुबमीनार में तीन सुरंगें थीं, जो अलग-अलग जगहों पर जाकर खुलती थीं। उन्होंने बताया कि बचपन में वो इन सुरंगों में खेला करते थे। हरीश कुमार, जो इस गांव में लंबे वक्त से रह रहे हैं, बताते हैं कि हर साल 15 अगस्त को वह इस मीनार पर राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं। वह कहतेहैं कि ये काम वह अपनी मर्ज़ी से करते हैं। और ये परंपरा लंबे समय से चली आ रही है और स्थानीय लोग इसे गर्व की बात मानते हैं।

हस्तसाल गांव का नाम कैसे पड़ा?

इस गांव का नाम ‘हस्तसाल’ क्यों पड़ा, इसे लेकर भी कई कहानियां प्रचलित हैं। कहा जाता है कि ये गांव कभी हाथियों के आराम करने की जगह हुआ करता था, इसलिए इसे ‘हस्तसाल’ कहा जाने लगा। ये जगह कभी जंगल से घिरी हुई थी, जहां मुगल शासकों के हाथियों का बसेरा हुआ करता था। धीरे-धीरे ये जंगल खत्म हो गया और अब ये क्षेत्र एक घनी आबादी वाला इलाका बन चुका है। जहां अलग-अलग समुदाय के लोग रहते हैं।

मीनार की आज की स्थिति

आज मिनी कुतुबमीनार का रखरखाव बहुत अच्छी स्थिति में नहीं है। समय के साथ इसका क्षरण हो रहा है और इसकी सुरक्षा को लेकर कोई विशेष कदम नहीं उठाए गए हैं। हालांकि, स्थानीय लोग इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाने के लिए प्रयास कर रहे हैं। मिनी कुतुब मीनार दिल्ली की एक अनोखी ऐतिहासिक धरोहर है, जो बहुत कम लोगों को ही पता है। ये न केवल मुगल स्थापत्य का एक ख़ूबसूरत उदाहरण है, बल्कि इसके साथ कई दिलचस्प कहानियां भी जुड़ी हुई हैं। अगर इसे ठीक से संरक्षित किया जाए, तो यह भी दिल्ली के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों में शामिल हो सकता है। स्थानीय लोगों की इसमें गहरी आस्था और जुड़ाव है, जो इसे और भी ख़ास बनाता है।

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