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इंशा अल्लाह ख़ान: लफ़्ज़ों का वो शायर जिसे आज़ाद ने दिया अमीर ख़ुसरो का दर्जा

उर्दू अदब की तारीख़ में कुछ नाम ऐसे हैं जो अपनी चमक से पूरे अफ़साने को रोशन कर देते हैं। उन्हीं में से एक हैं इंशा अल्लाह ख़ान इंशा, जिनकी ज़िंदगी, शायरी और अदबी ख़िदमात ने उर्दू ज़बान को एक नई बुलंदी बख़्शी। वो सिर्फ़ एक शायर नहीं थे, बल्कि एक ऐसे अदीब थे जिनकी क़लम से निकले, हर लफ़्ज़, एक कहानी कहते हैं। उनकी शख़्सियत इतनी रंगीन और कारनामे इतने क़ाबिल-ए-तारीफ़ थे कि आज भी जब उनकी बात होती है, तो उर्दू अदब का हर शागिर्द फ़ख़्र महसूस करता है।  मोहम्मद हुसैन आज़ाद ने उन्हें ‘उर्दू का अमीर ख़ुसरो’ कहा, तो वहीं बेताब का यह मशहूर क़ौल भी है।

जज़्बा-ए-इश्क़ सलामत है तो इंशा-अल्लाह
कच्चे धागे से चले आएंगे सरकार बंधे

इंशा अल्लाह ख़ान इंशा

इब्तिदाई ज़िंदगी और तालीम

इंशा अल्लाह ख़ान की पैदाइश तक़रीबन 1752 ईसवी में मुर्शिदाबाद में हुई थी। उनके वालिद सय्यद माशा अल्लाह ख़ान, भी इल्म और फ़ज़्ल के मालिक थे। इंशा ने इब्तिदाई तालीम अपने घर पर ही हासिल की, जहां उन्होंने अरबी और फ़ारसी पर ख़ासी महारत हासिल की। ये वो दौर था जब मुग़लिया सल्तनत अपने आख़िरी दौर में थी, और हिंदुस्तान में सियासी उथल-पुथल मची हुई थी। लेकिन इस सब के बावजूद, इल्म और अदब की महफ़िलें अपनी जगह क़ायम थीं। इंशा की तालीम सिर्फ़ किताबों तक महदूद नहीं थी। उन्होंने उस वक़्त के माहिर उस्तादों से फ़न-ए-शायरी, फ़न-ए-नग़मा और कई दूसरे उलूम में भी दस्तरस हासिल की। उनकी ज़हानत का ये आलम था कि जो कुछ भी वो पढ़ते या सुनते थे, वो उनके ज़हन में नक़्श हो जाता था।

लखनऊ का सफ़र और शाही दरबार में क़द्रदानी

वक़्त बदला और हालात ने करवट ली। दिल्ली की सियासी नाज़ुक सूरत-ए-हाल के पेश-ए-नज़र इंशा ने लखनऊ का रुख़ किया, जो उस वक़्त अदब और सकाफ़त का मरकज़ बन चुका था। यहां उन्हें नवाब सआदत अली ख़ान के दरबार में बड़ी क़द्र और इज़्ज़त हासिल हुई। वो नवाब के मुसाहिब और दरबारी शायर बन गए। शाही दरबार में उनकी हाज़िर-जवाबी, ज़राफ़त और अदबी सलाहियत ने सबको अपना दीवाना बना लिया। वो महफ़िलों की शान थे, और उनके एक-एक लफ़्ज़ पर दाद मिलती थी।

लैला ओ मजनूं की लाखों गरचे तस्वीरें खिंचीं
मिल गई सब ख़ाक में जिस वक़्त ज़ंजीरें खिंचीं

इंशा अल्लाह ख़ान इंशा

इंशा और नवाब की मज़ाहिया महफ़िल से दो दिलचस्प वाक़यात

एक रोज़ का ज़िक्र है- लखनऊ की एक शाही दावत में सैयद इंशा नवाब आसिफ़ उद्दौला साहब के साथ दस्तरख़्वान पर बैठे थे। गर्मी ज़्यादा थी, सो इंशा साहब ने दस्तार उतार कर एक तरफ़ रख दिया। उनका मुंडा हुआ सर देख कर नवाब साहब की तबीयत में शरारत जागी। पीठ पीछे से हल्के हाथ की एक धौल मार दी।

इंशा साहब ने फ़ौरन टोपी उठाकर सर पर रखी और मुस्कुरा कर बोले- “सुब्हान अल्लाह! बचपन में बुज़ुर्गों से सुना था कि नंगे सर खाना खाओ तो शैतान धौलें मारा करता है… आज आप ही की सूरत में उसकी तसदीक़ हो गई। नवाब साहब ये सुनकर ज़ोर-ज़ोर से हंस पड़े।

नवाब आसिफ़ उद्दौला और इंशा अल्लाह ख़ां हाथी पर सवार होकर लखनऊ की गलियों से गुज़र रहे थे। सफ़र के दौरान एक मंज़र देखा एक कुत्ता किसी क़ब्र पर पेशाब कर रहा था। नवाब साहब की ज़बान पर फ़ब्ती आई और उन्होंने मुस्कुरा कर कहा

इंशा, ये किसी सुन्नी की क़ब्र मालूम होती है। इंशा ने ताबड़तोड़ जवाब दिया। हुज़ूर, आप बिल्कुल दुरुस्त फरमा रहे हैं… लेकिन पेशाब करने वाला शिया लग रहा है।
यह सुनते ही नवाब साहब का क़हक़हा फूट पड़ा —वो हंसी जो महफ़िलों की जान होती थी।
इन दोनों वाक़यात से न सिर्फ़ इंशा की हाज़िरजवाबी का अंदाज़ झलकता है, बल्कि लखनऊ की उस तहज़ीब की तस्वीर भी उभरती है, जिसमें तल्ख़ियां भी ज़राफ़त के गुलदस्ते में पेश की जाती थीं।

हर रंग और हर अंदाज़ में शायरी 

इंशा अल्लाह ख़ान की शायरी में एक तरह की चंचलता और क़िस्में पाई जाती हैं। उन्होंने हर सिंफ़-ए-सुख़न में हाथ आज़माया और हर जगह अपनी महारत का लोहा मनवाया। ग़ज़ल, नज़्म, क़सीदा, मर्सिया, रेख़्ती। हर सिंफ़ में उनकी अपनी एक अनोखी पहचान थी। उनकी ज़बान में एक ख़ास तरह की नर्मी, रवानी और मौसिक़ीयत थी जो क़ारी को अपनी तरफ़ खींच लेती थी।

मिल मुझ से ऐ परी तुझे क़ुरआन की क़सम
देता हूं तुझ को तख़्त-ए-सुलैमान की क़सम
कर्र-ओ-बयों की तुझ को क़सम और ‘अर्श की
जिबरील की क़सम तुझे रिज़वान की क़सम

इंशा अल्लाह ख़ान इंशा

उनकी ग़ज़लों में सादगी और दिलकशी का एक अनोखा संगम मिलता है। वो आम ज़बान में ऐसे शेर कहते थे जो सीधे दिल में उतर जाते थे

नज़्म में नई तरकीबें: उन्होंने नज़्म निगारी में भी नए तजुर्बे किए और अपने वक़्त से आगे की सोच रखी।

रेख़्ती के बानी: रेख़्ती, एक ऐसी सिंफ़ जिसमें औरतों की ज़बान में उनके जज़्बात और एहसास बयान किए जाते हैं, इंशा को उसका बानी तस्लीम किया जाता है। उन्होंने इस सिंफ़ को एक नई पहचान दी और इसमें अपनी बेमिसाल सलाहियतों का मुज़ाहिरा किया।

शायरी में ज़राफ़त: उनकी शायरी में ज़राफ़त और मजाक का भी एक बड़ा हिस्सा था। वो अपनी बात को इस अंदाज़ में कहते थे कि लोग हंसते-हंसते लोट-पोट हो जाते थे। ये उनकी एक ख़ास पहचान थी।

कर लेता हूं बंद आंखें मैं दीवार से लग कर
बैठे है किसी से जो कोई प्यार से लग कर

इंशा अल्लाह ख़ान इंशा

नस्र निगारी और उर्दू अदब की ख़िदमत

इंशा अल्लाह ख़ान सिर्फ़ एक शायर ही नहीं थे, बल्कि एक आला दर्जे के नस्र निगार भी थे। उनकी नस्र में सफ़ाई, रवानी और एक ख़ास तरह का लुत्फ़ पाया जाता है। उर्दू नस्र को संवारने और उसे आसान और आम फ़हम बनाने में उनका किरदार निहायत अहम है।

उनकी सबसे मशहूर नस्री तस्नीफ़ “रानी केतकी की कहानी” है। ये एक ऐसी कहानी है जो उन्होंने खालिस हिंदवी (उर्दू से पहले की हिंदी) में लिखी थी, जिसमें अरबी-फ़ारसी के अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल ना के बराबर था। इस कहानी का मक़सद ये दिखाना था कि उर्दू ज़बान अरबी-फ़ारसी के बग़ैर भी अपने दम पर एक ख़ूबसूरत अदबी शाहकार पेश कर सकती है। ये उर्दू ज़बान के लिए एक बहुत बड़ा क़दम था, जिसने उसे अपनी एक अलग पहचान दी।

रानी केतकी की कहानी” उर्दू नस्र में एक मील का पत्थर है, जिसने साबित किया कि उर्दू सिर्फ़ अदबी ज़बान ही नहीं, बल्कि आम लोगों की ज़बान भी बन सकती है।

इसके अलावा, उनकी एक और अहम तस्नीफ़ “दरिया-ए-लताफ़त” है, जो उर्दू ज़बान की ग्रामर और इल्म-ए-बयान पर एक बेहतरीन किताब है। ये किताब उर्दू ज़बान के क़वायद को समझने के लिए आज भी एक अहम माख़ज़ मानी जाती है। उन्होंने उर्दू ज़बान के लफ़्ज़ों की पैदाइश, उनके इस्तेमाल और सही तलफ़्फ़ुज़ पर बहुत गहराई से रोशनी डाली है। ये उनका उर्दू ज़बान के लिए एक बहुत बड़ा इल्मी सरमाया है। इंशा अल्लाह ख़ान की शख़्सियत इतनी बहुमुखी थी कि उन्हें सिर्फ़ एक दायरे में क़ैद करना मुश्किल है। वो एक ही वक़्त में एक माहिर शायर, नस्र निगार, माहिर-ए-लिसानियात, मज़ाहिया निगार और एक बेहतरीन दोस्त थे। उन्होंने उर्दू ज़बान को नई राहें दिखाईं और उसे अपने वक़्त से आगे ले गए। उनकी अदाकारी, हाज़िर-जवाबी और महफ़िल-आराई उन्हें हमेशा लोगों के दिल में ज़िंदा रखती है। उनके बारे में ये भी कहा जाता है कि वो एक बहुत ही तजुर्बेकार मुंशी भी थे। वो अपने वक़्त के हालात और सियासी उथल-पुथल पर भी अपनी कलम से रौशनी डालते थे, हालांकि ये तहरीर ज़्यादातर मसूर (छुपी) रहती थीं।

इंशा अल्लाह ख़ान को उनके ज़माने में कोई औपचारिक “अवार्ड” तो नहीं मिले, जैसा कि आज के दौर में होते हैं। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान और अवॉर्ड नवाबों और हुक्मरानों की तरफ़ से मिलने वाली क़द्रदानी, इज़्ज़त और शाही सरपरस्ती थी। शाही दरबार में उनका मुक़ाम, नवाबों की उनसे मुहब्बत और अदबी हलक़ों में उनकी शोहरत ही उनके लिए सबसे बड़ा अवार्ड थी। उस दौर में शायरों और अदीबों को नकद इनाम, जागीरें और ख़िलअतें दी जाती थीं, जो इंशा को भरपूर मिक़दार में मिलीं।

उनकी अदबी क़ाबिलियत का ये आलम था कि उस वक़्त के बड़े-बड़े शायर और अदीब उनकी ज़हानत और अदबी सलाहियतों का लोहा मानते थे। आज भी उर्दू अदब की तारीख़ में उनका नाम सुनहरे हर्फ़ों में लिखा जाता है।

ये भी पढ़ें: ख़्वाजा मीर दर्द: सूफ़ियाना शायरी के ‘इमाम’ और रूहानी ग़ज़ल के बेताज बादशाह


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