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Prof. Zargar Zahoor: कश्मीर की गलियों से अंतरराष्ट्रीय मंच तक, रंग और जुनून की अनकही कहानी

कश्मीर के मशहूर कलाकार Prof. Zargar Zahoor कला को जीते हैं। वो सिर्फ़ एक पेंटर नहीं, बल्कि ऐसे टीचर हैं जिन्होंने अपनी कला के ज़रिए सैकड़ों युवाओं की ज़िंदगी में रोशनी भर दी। जामिया मिलिया इस्लामिया के फ़ैकल्टी ऑफ़ फ़ाइन आर्ट्स के पूर्व डीन रह चुके Prof. Zargar Zahoor को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी खूब सराहा गया है। लेकिन अपनी सारी उपलब्धियों के बावजूद उन्होंने 2017 में फिर से वापस कश्मीर आने का फैसला लिया, ताकि घाटी के युवाओं को कला सिखा सकें।

Prof. Zargar Zahoor: रंगों में रची-बसी ज़िंदगी की कहानी

Prof. Zargar Zahoor की कहानी श्रीनगर की गलियों से शुरू होती है। जब वो 9th क्लास में थे तभी उन्होंने ठान लिया था कि वो आर्टिस्ट बनेंगे। उनका बचपन कला के माहौल में बीता उनकी मां रेडियो कश्मीर की एक मशहूर ड्रामा आर्टिस्ट थीं। वो जब अपनी मां के साथ रेडियो स्टेशन जाते, तो रिहर्सल के दौरान एक कोने में बैठकर स्केच बनाया करते थे। लोगों को ये देखकर हैरानी होती कि ये बच्चा इतनी कम उम्र में इतना अच्छा कैसे ड्रॉ कर सकता है।

एक दिन रेडियो कश्मीर के प्रसिद्ध कलाकार उमेश कोल ने उनकी मां से कहा “ये बच्चा बहुत अच्छा आर्ट कर रहा है, इसे इंस्टिट्यूट ऑफ़ म्यूज़िक एंड फाइन आर्ट्स में दाख़िला दिलाइए।” बस, वहीं से Zargar का कला सफ़र शुरू हुआ। वो दिनभर एस.पी. कॉलेज में पढ़ाई करते और शाम को इवनिंग कोर्स में आर्ट की क्लासेज़ लेते। उनके ज़्यादातर टीचर बड़ौदा (गुजरात) से आए थे, जिनकी सोच और कला ने ज़रगर को गहराई से प्रभावित किया। तभी मन में ठान लिया कि एक दिन वो भी बड़ौदा स्कूल ऑफ़ फाइन आर्ट्स से पढ़ेंगे।

कश्मीर से बड़ौदा तक: जुनून और संघर्ष की कहानी

70 के दशक में कश्मीर से किसी का बड़ौदा जाकर आर्ट की पढ़ाई करना आसान नहीं था। लेकिन Prof. Zargar Zahoor के जुनून ने सब मुश्किलें आसान कर दी। उनके पिता के पुराने दोस्त ने उनकी मदद की। वो कहते हैं “मैं जब बड़ौदा पहुंचा तो मुझे लगा कि मैं एक नई दुनिया में आ गया हूं। वहां के प्रोफ़ेसर्स, वहां की सोच सबने मुझे बदल दिया।” उन्होंने वहां सात साल बिताए, पांच साल बीए और दो साल मास्टर्स में। उनका सब्जेक्ट था विज़ुअलाइज़ेशन, जिसमें वो देश के दूसरे ऐसे स्टूडेंट बने जिन्होंने इस सब्जेक्ट में मास्टर्स डिग्री हासिल की।

उन दिनों उन्हें 200 रूपये की स्कॉलरशिप मिलती थी, जिसमें 100 रूपये मेस का खर्च चला जाता। बाकी पैसों से वो कैनवस और रंग खरीदते। कभी-कभी जब यूनिवर्सिटी बंद होती, तो वो दोस्तों के साथ खेतों में पानी देकर कुछ पैसे कमाते ताकि कला का सफ़र जारी रह सके। वो मुस्कराते हुए कहते हैं, “जब इंसान अकेला होता है, तभी वो असली खुद को पहचानता है। गरीबी ने मुझे तोड़ा नहीं, गढ़ा है।”

जामिया मिलिया इस्लामिया: एक टीचर का नया अध्याय

1985 में Prof. Zargar Zahoor ने जामिया मिलिया इस्लामिया में अप्लाइड आर्ट के पद के लिए आवेदन किया। 30 उम्मीदवारों में से सिर्फ़ वही चुने गए। वो कहते हैं, “मैं दिल्ली आया, लेकिन शुरूआती दिन आसान नहीं थे। शुरू में वो कश्मीर हाउस में रहे लेकिन कभी – कभी वहां रूकने के इजाज़त नहीं मिलती थी, तो रेलवे स्टेशन जाना पड़ता था वो रातभर स्टेशन पर बैठकर पेंटिंग बनाते थे। सुबह छह बजे बस पकड़कर क्लास में पहुंच जाता था। स्टूडेंट्स को कभी पता नहीं चला कि उनका प्रोफ़ेसर रात कहां सोया था।”

जामिया में उन्होंने 30 साल तक पढ़ाया 1985 से 2015 तक। वो डिपार्टमेंट हेड और बाद में डीन भी बने। उनका सब्जेक्ट Applied Art था यानी विचारों को विज़ुअल्स में ढालना, प्रोडक्ट को लोगों तक पहुंचाना, विज्ञापन की क्रिएटिव रिसर्च करना। वो स्टूडेंट्स को बताते थे “विज़ुअलाइजेशन का मतलब सिर्फ़ चित्र बना ना नहीं, बल्कि सोच को आकार देना है।” उनकी क्लासेस सुबह 8:30 बजे से शुरू होतीं, और आधा दिन वो स्टूडेंट्स के साथ रहते। दोपहर बाद वो अपने स्टूडियो में जाकर पेंटिंग करते। इसी डिसिप्लिन ने उन्हें एक सफल टीचर और कलाकार दोनों बनाया।

पेंटिंग से अंतरराष्ट्रीय पहचान तक

दिल्ली में Prof. Zargar Zahoor ने अपना पहला शो Alliance Française (फ्रांसीसी दूतावास) में किया, जिसमें उनकी सभी पेंटिंग्स बिक गई। वो कहते हैं, “जब देखा कि लोग मेरी बनाई पेंटिंग खरीद रहे हैं, तो लगा कि मेरा रास्ता सही है।” इसके बाद उन्होंने भारत और विदेशों में प्रदर्शनियां की — फ्रांस, चीन, सऊदी अरब और कई यूरोपीय देशों में। उन्हें भारत सरकार की ओर से चीन भेजा गया, जहां उन्होंने इंडिया को रिप्रेज़ेंट किया। सऊदी अरब की एक यूनिवर्सिटी ने भी उन्हें सम्मानित किया और उनकी कला को सराहा। वो बताते हैं “जब चीन में मुझे अवार्ड मिला, तो लगा मेरी मां की मेहनत और दुआएं मेरे साथ हैं। उन्होंने ही मेरे अंदर कला का बीज बोया था।”

कश्मीर की मिट्टी में लौटे रंगों के सरताज

2015 में Prof. Zargar Zahoor ने रिटायरमेंट के बाद कश्मीर लौटने का फैसला लिया। उन्होंने श्रीनगर में एक स्टूडियो स्थापित किया और घाटी के युवाओं को कला सिखाने लगे। वो कहते हैं, “कला सिखाने का असली आनंद तब है जब आप उसे समाज को लौटाते हैं।”आज वो नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ फैशन टेक्नोलॉजी (NIFT) श्रीनगर में बतैर गेस्ट फैकल्टी पढ़ाते हैं। वो कहते हैं, “मुझे बच्चों के साथ रहना अच्छा लगता है।”

कला का दर्शन: रंगों के पीछे की सोच

Prof. Zargar Zahoor की कला इंप्रेशनिज़्म से प्रभावित है वो प्रकृति से प्रेरणा लेते हैं, लेकिन उसे हूबहू नहीं बनाते। Zargar कहते हैं कि, “मुझे तस्वीर जैसी परफेक्ट चीज़ नहीं चाहिए। मैं उस पल का अहसास पकड़ना चाहता हूं वो जो मन में रह जाए।” वो अपने स्टूडेंट्स को बेसिस सीखाते है वो मानते हैं कि अगर बच्चों का बेसिक मज़बूत होगा तभी वो अच्छे आर्टिस्ट बन पाएंगे। वो समझाते हैं कि लाइन, शेप और कलर सिर्फ़ डिज़ाइन नहीं हैं, बल्कि भावनाएं हैं। उनके मुताबिक़, “कला में परफेक्शन के साथ इमोशन बहुत ज़रूरी है।”

Prof. Zargar Zahoor की ज़िंदगी सिखाती है कि सफलता कभी अचानक नहीं मिलती। वो अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि, “कभी-कभी पेट खाली था, लेकिन दिल भरा हुआ था। रंग और ब्रश ही मेरी ताक़त थे।” आज भी वो कश्मीर की गलियों में अपने स्टूडेंट्स के साथ स्केचिंग करते दिखाई देते हैं, किसी पार्क में, किसी झील के किनारे या किसी पहाड़ी रास्ते पर। वो कहते हैं कि “मैं चाहता हूं बच्चे अपनी मिट्टी को देखें, महसूस करें, तभी उनकी कला में सच्चाई आएगी।”

आर्ट कभी रिटायर नहीं होती

Prof. Zargar Zahoor बताते हैं कि पहले कश्मीर में कला को करियर नहीं माना जाता था। “लोग सोचते थे कि आर्टिस्ट बस लंबे बालों वाले शायर लोग हैं, जिनका कोई काम नहीं होता। लेकिन अब समय बदल गया है। माता-पिता अपने बच्चों को कला सिखाने में गर्व महसूस करते हैं।” वो मानते हैं कि आज सोशल मीडिया और नए प्लेटफॉर्म्स ने कलाकारों के लिए नए दरवाज़े खोले हैं।

Prof. Zargar Zahoor की आंखों में चमक आ जाती है जब वो कहते हैं कि, “मैंने क्लासरूम छोड़ दिया है, लेकिन ब्रश अभी भी मेरे साथ है। आर्ट कभी रिटायर नहीं होती।” वो हर दिन कुछ नया बनाते हैं कश्मीर की झीलें, लकड़ी के पुराने घर, पहाड़ी रास्ते, और लोगों के भाव। उनकी हर पेंटिंग कश्मीर की रूह से जुड़ी होती है। “मैं दिल्ली में भी पेंट करता था, पर मेरे हाथों से हमेशा कश्मीर ही निकलता था। लगता है ये मेरी रगों में बसा है।”

युवाओं के लिए उनका संदेश

Prof. Zargar Zahoor कहते हैं “कला आपको पहचान नहीं देती, बल्कि आपको पहचान बनाना सिखाती है। अगर मेहनत, धैर्य और सच्चाई है, तो कला आपको कभी धोखा नहीं देगी।” Prof. Zargar Zahoor ने दुनिया के सबसे बड़े आर्ट प्लेटफॉर्म्स पर पहचान बनाई, फिर भी अपने मूल से जुड़े रहे। उनकी ज़िंदगी का हर रंग एक मैसेज देता है कि, “कला सिर्फ़ दिखने की चीज़ नहीं, जीने का तरीका है।” आज Prof. Zargar Zahoor कश्मीर के युवाओं के लिए एक उदाहरण हैं कि चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों, अगर आपके पास रंग हैं, तो ज़िंदगी हमेशा ख़ूबसूरत बनेगी।

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