Tuesday, March 10, 2026
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हमारे अमरोहा के जौन एलिया 

”मै जो हूं जॉन एलिया हूं जनाब 

इस का बेहद लिहाज़ कीजिएगा”
हिंदुस्तान का शहर अमरोहा देश के बंटवारे से पहले भी एक छोटा सा शहर ही था। मगर यहां की मिट्टी में बड़े-बड़े नाम नाम पैदा हुए। इतने बड़े कि उर्दू लिटरेचर और उर्दू दुनिया में अमरोहा का नाम आते ही निगाहें अदब से झुक जाती हैं। इसी अमरोहा के एक नामवर सैयद घराने में 14 दिसंबर 1931 को एक बच्चा आंख खोलता है, जिसका नाम रखा जाता है सैयद हुसैन जौन असग़र। 

तीख़ी और तराशी ज़बान में निहायत गहरी और शोर अंगेज़ बातें कहने वाले हफ़्त ज़बान शायर, सहाफ़ी, थिंकर, ट्रांसलेटर, लेखक, दानिशवर और अनारकिस्ट जॉन एलिया एक ऐसे शायर थे जिनकी शायरी ने न सिर्फ़ उनके ज़माने के अदब नवाज़ों के दिल जीत लिए बल्कि जिन्होंने अपने बाद आने वाले उर्दू दबीरों और शायरों के लिए ज़बान-ओ-बयान के नए रास्ते तय किए।

‘’ जो गुज़ारी न जा सकी हम से
 हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है’’
 ‘’मैं भी बहुत अजीब हूं इतना अजीब हूँ कि बस
ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं’’

जौन एलिया ने अपनी शायरी में इश्क़ के नये रास्तों का सुराग़ लगाया। वो बाग़ी, इन्क़लाबी और रिवायत तोड़ने वाले थे लेकिन उनकी शायरी का लहज़ा इतना अच्छा, नर्म और गाने वाला है कि, उनके अश्आर में मीर तक़ी मीर के नश्तरों की तरह सीधे दिल में उतरते हुए सामेईन को फ़ौरी तौर पर उनकी फनकाराना कला पर ख़ुसूसिय्यत ग़ौर करने का मौक़ा ही नहीं देते। मीर के बाद यदा-कदा नज़र आने वाली तासीर की शायरी को लगातार नई गहराईयों तक पहुंचा देना जौन एलिया का कमाल है। अपनी निजी ज़िंदगी में जौन एलिया की मिसाल उस बच्चे जैसी थी जो कोई खिलौना मिलने पर उससे खेलने की बजाए उसे तोड़ कर कुछ से कुछ बना देने की धुन में रहता है, अपनी शायरी में उन्होंने इस रवय्ये का इज़हार बड़े सलीक़े से किया है।

पाकिस्तान के नामचीन सहाफ़ी रईस अमरोहवी और मशहूर मनोवैज्ञानिक मुहम्मद तक़ी जौन एलिया के भाई थे, जबकि फ़िल्म साज़ कमाल अमरोही उनके चचाज़ाद भाई थे। जौन एलिया के वालिद सय्यद शफ़ीक़ हसन एलिया एक ग़रीब शायर और आलिम थे। जौन एलिया के बचपन और लड़कपन के वाक़ियात जौन एलिया के अल्फ़ाज़ों में हैं, जैसे, “अपनी पैदाइश के थोड़ी देर बाद छत को घूरते हुए मैं अजीब तरह हंस पड़ा, जब मेरी ख़ालाओं ने ये देखा तो डर कर कमरे से बाहर निकल गया । इस बेमहल हंसी के बाद मैं आज तक खुल कर नहीं हंस सका।” या “आठ बरस की उम्र में मैंने पहला इश्क़ किया और पहला शेर कहा।”

‘’सारी दुनिया के ग़म हमारे हैं
और सितम ये कि हम तुम्हारे हैं’’
‘’किस लिए देखती हो आईना
तुम तो ख़ुद से भी ख़ूबसूरत हो’’

जौन की शुरूआती पढ़ाई अमरोहा के मदरसों में हुई जहां उन्होंने उर्दू, अरबी और फ़ारसी सीखी। नसबी किताबें से कोई दिलचस्पी नहीं थी और इम्तिहान में फ़ेल भी हो जाते थे। बड़े होने के बाद उर्दू, फ़ारसी और फ़लसफ़ा में एम.ए की डिग्रियां हासिल कीं। वो अंग्रेज़ी, पहलवी, इबरानी, संस्कृत और फ़्रांसीसी ज़बानें भी जानते थे। नौजवानी में वो कम्यूनिज़्म की तरफ़ उन्मुख हुए। तकसीम के बाद उनके बड़े भाई पाकिस्तान चले गए थे। वालिदा(मां) और वालिद(पापा) के इंतेक़ाल के बाद जौन एलिया को भी 1956 में न चाहते हुए भी पाकिस्तान जाना पड़ा और वो ज़िंदगीभर के लिए अमरोहा और हिन्दोस्तान को याद करते रहे। उनका कहना था, “पाकिस्तान आकर मैं हिन्दुस्तानी हो गया। रईस अमरोहवी ने एक इलमी-ओ-अदबी रिसाला “इंशा” जारी किया, जिसमें जौन संपादकीय लिखते थे। बाद में उस रिसाले को “आलमी डाइजेस्ट” में तब्दील कर दिया गया। उसी ज़माने में जौन ने इस्लाम से मिडिल ईस्ट का राजनितिक इतिहास संपादित किया और बातिनी आंदोलन के साथ साथ फ़लसफ़े पर अंग्रेज़ी, अरबी और फ़ारसी किताबों के तर्जुमे किए। उन्होंने कुल मिला कर 35 किताबें संपादित कीं। और जौन एलिया का मिज़ाज बचपन से आशिक़ाना था। वो अक्सर ख़्यालों में अपनी महबूबा से बातें करते रहते थे।

‘’कैसे कहें कि तुझ को भी हम से है वास्ता कोई
तू ने तो हम से आज तक कोई गिला नहीं किया’’
‘’मुझे अब तुम से डर लगने लगा है
तुम्हें मुझ से मोहब्बत हो गई क्या’’

ये भी पढ़ें: दानिश महल: उर्दू की मिठास और लखनऊ की पहचान

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