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मजरूह सुल्तानपुरी: शायरी का वो मस्तमौला मुसाफ़िर, जिसने कलम से किया इश्क़ 

जब भी हिंदी सिनेमा की तरन्नुम भरी फ़िज़ाओं की बात होती है, जब भी मुशायरों की महफ़िलों में गूंजते हुए अशआर की रूहानी ख़ुशबू महसूस की जाती है, तब एक नाम अदब और मोहब्बत के साथ लिया जाता है मजरूह सुल्तानपुरी। उनका असली नाम था असरार-उल-हक़, लेकिन अदब की दुनिया उन्हें मजरूह के नाम से जानती है  एक ऐसा नाम जो फ़िल्मी गीतों से लेकर क्लासिकल ग़ज़लों तक, हर दिल में जगह बना गया।

सुल्तानपुर से सफ़र की शुरुआत

मजरूह सुल्तानपुरी की पैदाइश 1 अक्टूबर 1919 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर ज़िले में हुई थी। एक रूढ़िवादी मुस्लिम परिवार में पले-बढ़े असरार-उल-हक़ ने बचपन में अरबी, फ़ारसी और उर्दू की तालीम ली। 

मदरसे से तिब्बिया कॉलेज तक का सफ़र

मदरसे का माहौल बहुत सख़्त था, जो मज़रूह साहब को रास नहीं आया। नतीजा ये हुआ कि उन्होंने मदरसा छोड़ दिया और 1933 में लखनऊ के तिब्बिया कॉलेज में दाख़िला लिया। वहां से हिक्मत (Unani Medicine) में डिग्री ली और एक छोटा सा दवाख़ाना टांडा (ज़िला फैज़ाबाद) में खोल लिया। लेकिन ना तो दवाख़ाना चला और ना ही मर्ज़-ए-इश्क़ का इलाज मिला।

जी हां, इसी दौरान उन्हें वहीं की एक लड़की से मोहब्बत हो गई। मामला बदनामी तक पहुंचा और मज़रूह को वापस सुल्तानपुर लौटना पड़ा।

शायरी और संगीत का शौक़

तिब्बिया कॉलेज में रहते हुए उन्हें मौसिकी से भी गहरा लगाव हो गया। उन्होंने म्यूज़िक कॉलेज में दाख़िला लिया, लेकिन जब ये बात उनके वालिद को पता चली तो उन्होंने कड़ी नाराज़गी जताई और मजरूह को संगीत से दूर रहना पड़ा।

मगर शायरी की दुनिया ने उन्हें बांहों में भर लिया। 1935 में मजरूह ने पहली ग़ज़ल एक मुशायरे में पढ़ी और उनके सलीक़े और तरन्नुम ने सबका दिल जीत लिया। उनकी शायरी पर जिगर मुरादाबादी और प्रो. रशीद अहमद सिद्दीकी का गहरा असर रहा।

देख ज़िंदां से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार
रक़्स करना है तो फिर पांव की ज़ंजीर न देख

मजरूह सुल्तानपुरी

शायरी से इश्क़ कैसे हुआ?

मजरूह को शायरी से मोहब्बत एक इत्तिफ़ाक़ नहीं, बल्कि एक इंक़लाब की तरह हुई। कहते हैं कि एक बार किसी महफ़िल-ए-मुशायरा में एक दोस्त की ज़िद पर उन्होंने अपनी ग़ज़ल पढ़ी। ग़ज़ल कुछ यूं थी

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर,
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया

मजरूह सुल्तानपुरी

यह ग़ज़ल सुनते ही मुशायरे में मौजूद तमाम नामचीन शायरों ने उन्हें सराहा। वहीं से मजरूह के अदंर का शायर बाहर निकल आया। धीरे-धीरे वो मुशायरों का जाना-पहचाना नाम बन गए।

मुशायरों की महफ़िलों के चमकते सितारे

मजरूह ने उस दौर में शायरी की जब मंचों पर फिराक़ गोरखपुरी, जोश मलीहाबादी, जिगर मुरादाबादी, कैफ़ी आज़मी, अली सरदार जाफ़री जैसे धुरंधर शायर मौजूद थे। इन तमाम शायरों के बीच मजरूह का अंदाज़ सबसे जुदा था। ना जिगर की मस्ती, ना जोश का जोश बल्कि एक सलीक़ा, एक ठहराव और एक सादगी थी उनके अशआर में, जो दिल को छू जाती थी। मुशायरों में मजरूह की ग़ज़लें अक्सर तालियों की गूंज के बीच डूब जाती थीं। उनका एक मशहूर शेर

रोक सकता हमें ज़िंदान-ए-बला क्या ‘मजरूह’
हम तो आवाज़ हैं दीवार से छन जाते हैं

मजरूह सुल्तानपुरी

 बॉम्बे का बुलावा और नौशाद से मुलाक़ात

1945 की बात है। मजरूह एक मुशायरे के लिए बंबई (अब मुंबई) आए। उसी महफ़िल में मशहूर संगीतकार नौशाद अली भी मौजूद थे। उन्होंने मजरूह के अशआर सुने और फ़ौरन पहचान लिया कि ये आदमी सिर्फ़ शायर ही नहीं, एक बेहतरीन गीतकार भी बन सकता है। नौशाद ने उन्हें फ़िल्म ‘शाहजहां’ (1946) के लिए एक गाना लिखने की पेशकश की।

मजरूह पहले तो संकोच में पड़े रहे। फ़िल्मों को अदब की दुनिया में हेय दृष्टि से देखा जाता था। मगर नौशाद के इसरार और कैफ़ी आज़मी जैसे दोस्तों के समझाने पर मान गए। और फिर जो गाना लिखा, वो अमर हो गया

“जब दिल ही टूट गया, हम जी के क्या करेंगे…”

यह गाना के. एल. सहगल की आवाज़ में था और हिट हो गया। यही मजरूह के फ़िल्मी सफ़र की शुरुआत थी।

गीतों की दुनिया में बादशाहत

इसके बाद तो मजरूह सुल्तानपुरी ने जो लिखा, सोना बन गया। उन्होंने गुरुदत्त, देव आनंद, राज कपूर, शम्मी कपूर, लता मंगेशकर, रफ़ी, किशोर कुमार और कई बड़े सितारों के लिए ऐसे नग़मे लिखे जो आज भी ज़ुबां पर ताज़ा हैं।

कुछ बेहतरीन नग़मे

  • “चुरा लिया है तुमने जो दिल को…”
  • “रात कली एक ख़्वाब में आई…”
  • “ऐ मेरे हमसफ़र, एक ज़रा इंतज़ार…”

मजरूह के गीतों में इश्क़ का लहजा, दर्द की नरमी, और जज़्बात की रवानगी एक साथ मौजूद होती थी।

सियासी सोच और क़ैद की कहानी

मजरूह महज़ शायर नहीं थे, वो एक सियासी सोच रखने वाले इंसान भी थे। उन्होंने 1949 में उस वक़्त की हुकूमत के ख़िलाफ़ एक नज़्म लिखी थी, जिसमें आज़ादी के बाद के हालात पर कटाक्ष किया गया था। इसकी वजह से उन्हें एक साल की जेल भी हुई। लेकिन उन्होंने कभी कलम से समझौता नहीं किया। उनका यह शेर उनकी जुझारू सोच का गवाह है

कोई हम-दम न रहा कोई सहारा न रहा
हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा

मजरूह सुल्तानपुरी

मजरूह की अदबी पहचान

फिल्मों के गीतों से इतर, मजरूह की एक शायर के तौर पर भी गहरी पहचान थी। उन्होंने ग़ज़ल, नज़्म, रुबाई और बहुत कुछ लिखा। लेकिन उनका अंदाज़ हर जगह ख़ास रहा। उनकी ग़ज़लें दिल को सीधे छूती थीं, और उनके शब्दों में एक कसक, एक मोहब्बत और एक सच्चाई होती थी।उनकी एक मशहूर ग़ज़ल का मतला देखिए

मैं तो पत्थर था, मुझे फेंक दिया ठीक किया,
आज उस शहर में शीशे के मकां कैसे हैं।

मजरूह सुल्तानपुरी

अवॉर्ड्स और मक़बूलियत

मजरूह सुल्तानपुरी को उनके अदबी और फ़िल्मी योगदान के लिए कई सम्मान मिले।1993 में उन्हें हिंदुस्तानी सिनेमा का सबसे बड़ा इनाम दादा साहब फाल्के अवॉर्ड से नवाज़ा गया। वो पहले फ़िल्मी गीतकार थे जिन्हें यह पुरस्कार मिला। इसके अलावा उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड, ग़ालिब अवॉर्ड, इक़बाल सम्मान जैसे कई पुरस्कार भी मिले।

ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में मजरूह मुंबई के बांद्रा इलाक़े में एक छोटे से मकान में रहते थे। उन्होंने अपनी पूरी उम्र कलम के नाम कर दी  ना कभी पैसे के पीछे भागे, ना शोहरत के। वो कहते थे

बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए
हम एक बार तिरी आरज़ू भी खो देते

मजरूह सुल्तानपुरी

24 मई 2000 को यह सादा-सी ज़िंदगी जीने वाला शायर इस फानी दुनिया से रुख़्सत हो गया, मगर अपने पीछे ऐसा कलाम छोड़ गया जो आने वाली नस्लों के लिए मशअल-ए-राह बन गया।

मजरूह: एक मुकम्मल तासीर

मजरूह सुल्तानपुरी सिर्फ़ एक शायर नहीं, एक एहसास थे। उनकी शायरी मोहब्बत का तराना भी थी और ज़िंदगी का फ़लसफ़ा भी। उन्होंने जो लिखा, वो वक़्त की सीमाओं से परे है। उनकी शायरी और नग़मे आज भी मुहब्बत करने वालों की ज़बान पर हैं। उनकी ये पंक्तियां जैसे उनके सफ़र का निचोड़ हैं।

ऐसे हंस हंस के न देखा करो सब की जानिब
लोग ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं

मजरूह सुल्तानपुरी

ये भी पढ़ें: मजाज़ की आवाज़ बनी अलीगढ़ यूनिवर्सिटी की पहचान

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