बचपन की यादें हमेशा हमारे दिलों-दिमाग पर नक़्श होती हैं और जब बात गर्मियों की छुट्टियों की आए तो क्या कहने। जानी मानी राजनीतिज्ञ और लेखिका नजमा हेपतुल्ला ने आवाज़ द वॉयस को अपनी गर्मियों की छुट्टियों की कुछ यादें शेयर की। वो बताती हैं कि “हमें सालभर गर्मियों की छुट्टियों का इंतज़ार रहता था। हम अपने रिश्तेदारों के घर जाया करते थे। हमारी एक फ़ूफी की शादी मुंबई में हुई था और एक फ़ूफी की शादी लखनऊ में हुई थी।”
किसी साल वो मुम्बई जाती तो कभी लखनऊ जाती थीं। मुम्बई का ज़िक्र समन्दर के बग़ैर अधूरा है। दिन में हम मुम्बई घूमते और शाम को समन्दर किनारे जाते। वहां समन्दर की लहरों के साथ अठखेलियां करते, रेत से घर बनाते, जिसे समन्दर की लहरें अपने साथ बहा ले जाती थीं। हम भेलपूरी खाते, वड़ा पाव खाते, पाव भाजी और आइसक्रीम भी खाया करते थे। भोपाल में उनका घर तालाब के किनारे था। घर आंगन काफी बड़ा था और बग़ीचे में फलों के बहुत से दरख़्त जैसे आम, अमरूद, जामुन और शहतूत वगैरह थे।
छुट्टियों के बाद स्कूल खुलने का रहता था बेसब्री से इंतज़ार
नजमा साहिबा बचपन से ही पढ़ाई में बहुत अच्छी थीं। वे बताती हैं कि गर्मियों की छुट्टियों के आग़ाज़ में ही वे अपना होमवर्क मुकम्मल कर लिया करती थीं। उन्हें गर्मियों की छुट्टियों में स्कूल खुलने का इंतज़ार रहता था।
बचपन के किसी ख़ूबसूरत और न भूलने वाले वाक़िये के बारे में वो बताती हैं कि उनकी ख़ाला ने उनका दाख़िला केजी में करवाया था। वहां टीचर ने उन्हें एक किताब दी। उन्होंने घर आकर पूरी किताब पढ़ ली और अगले दिन स्कूल जाकर अपनी टीचर से कहा कि मैंने पूरी किताब पढ़ ली है इसलिए मुझे पढ़ने के लिए एक किताब और चाहिए। इस पर टीचर ने हैरान होकर कहा कि ये किताब तो तुम्हें पूरे साल पढ़नी थी।
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