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शाह मुबारक आबरू: रेख़्ता का पहला साहब-ए-दीवान शायर

उत्तर भारत में उर्दू शायरी को एक नया रंग देने वाले, उर्दू के शुरुआती और सबसे अहम शायरों में से एक, शाह मुबारक आबरू की कहानी बहुत दिलचस्प है। वो सिर्फ़ एक शायर नहीं थे, बल्कि अपने ज़माने के मिज़ाज और रंग को अपनी शायरी में उतारने वाले एक कलाकार थे। जहां दिल्ली में फ़ारसी का सिक्का चलता था, वहां आबरू और उनके साथी शायरों ने उर्दू को एक नई पहचान दी, उसे आम लोगों की ज़बान बनाया।

आबरू का असली नाम नजम्मुद्दीन शाह मुबारक आबरू था और वो ग्वालियर में 1683 ईस्वी में पैदा हुए थे। उनके दादा मशहूर सूफ़ी बुज़ुर्ग मुहम्मद ग़ौस गवालियारी थे। इस रिश्ते से वो उर्दू और फ़ारसी के बड़े विद्वान ख़ान आरज़ू के रिश्तेदार और शागिर्द भी थे। उनकी ज़िंदगी की शुरुआत ग्वालियर में हुई, लेकिन जवानी में वो दिल्ली आ गए और शाही मुलाज़मत से जुड़ गए। इस नौकरी के दौरान उन्हें इज़्ज़त और दौलत दोनों मिली। वो अपने ज़माने के खुशहाल लोगों में गिने जाते थे।

दिल्ली में दर्द-ए-दिल कूं कोई पूछता नहीं
मुझ कूं क़सम है ख़्वाजा-क़ुतुब के मज़ार की

शाह मुबारक आबरू

फ़ारसी से रेख़्ता तक

जब वली दकनी का दीवान 1720 ईस्वी में दिल्ली पहुंचा, तो उर्दू शायरी को एक नई पहचान मिली। इससे पहले उर्दू में शायरी बस मज़ाक़ के लिए या ‘मुंह का ज़ायका बदलने’ के लिए की जाती थी, लेकिन वली की शायरी ने लोगों को दिखाया कि उर्दू में भी गहराई और ख़ूबसूरती है। इसी से मुत्तासिर होकर आबरू, फ़ाइज़, शरफ़ उद्दीन मज़मून और मुहम्मद शाकिर नाज़ी जैसे शायरों ने रेख़्ता(उर्दू) को अपना लिया।

शोधकर्ताओं के बीच इस बात पर काफ़ी बहस रही है कि उत्तर भारत में पहला साहिब-ए-दीवान (जिसका पूरा दीवान मौजूद हो) शायर कौन है। डॉक्टर मुहम्मद हुसैन जैसे विद्वानों का कहना है कि फ़ाइज़ के दीवान के बारे में ठोस सबूत नहीं मिलते, जबकि हातिम का पूरा दीवान भी मौजूद नहीं है। ऐसे में, आबरू का दीवान ही उत्तर भारत में उर्दू का पहला प्रामाणिक दीवान माना जाता है। इस तरह, आबरू को उत्तर भारत का पहला साहिब-ए-दीवान शायर होने का ख़ास रुतबा हासिल है।

एक रंगीन मिज़ाज और मुहम्मद शाही दौर की तस्वीर

आबरू की शायरी उनके दौर, यानी मुहम्मद शाही दौर की पूरी तस्वीर पेश करती है। यह दौर मौज-मस्ती, ख़ुशहाली और ज़िंदगी को पूरी तरह जीने का दौर था। आबरू की शायरी में भी वही बेबाकी, वही रंगीन मिज़ाज और वही चुलबुलापन दिखाई देता है।

मिल गईं आपस में दो नज़रें इक आलम हो गया
जो कि होना था सो कुछ अंखियों में बाहम हो गया

शाह मुबारक आबरू

वो ईहामगोई (द्विअर्थी शब्दों का इस्तेमाल) को उर्दू में फैलाने वाले सबसे अहम शायरों में से थे। बहुत से लोग इस पर उनकी आलोचना करते हैं, लेकिन यह उनकी मजबूरी भी थी और ज़रूरत भी। आबरू और उनके साथी शायर अपनी शायरी को हिंदुस्तानियत का रंग देना चाहते थे, न कि ईरानियत का। हिंदी के श्लेष अलंकार (ईहाम) का इस्तेमाल करके वो आम लोगों तक अपनी बात पहुंचाते थे। यही तरीक़ा बाद में लखनऊ के शायरों ने भी अपनाया।

उनकी शायरी में मुहम्मद शाही दौर की सामाजिक और सांस्कृतिक झलक साफ़ दिखाई देती है। इश्क़ सिर्फ़ दिल तोड़ने या रोने-कुढ़ने का नाम नहीं था। उस दौर में बाज़ारी औरतें और ख़ूबसूरत लड़के माशूक़ का दर्जा रखते थे। आबरू ने अपने कलाम में मशहूर तवाएफ़ों जैसे पन्ना ममोला और जमाल का ज़िक्र किया है, जो अपने ज़माने की ‘सेलिब्रिटी’ हुआ करती थीं। वो उनके हुस्न की नहीं, बल्कि उनके फ़न की तारीफ़ करते थे।

मशहूर तवायफ़ पन्ना के बारे में वो कहते हैं: क़ियामत राग, ज़ालिम भाव, काफ़िर गत है ऐ पन्ना तुम्हारी चीज़ सो देखी सो इक आफ़त है ऐ पन्ना

वो सिर्फ़ औरतों के ही नहीं, बल्कि अम्रद परस्ती (ख़ूबसूरत लड़कों से इश्क़) के भी दीवाने थे। सैयद शाह कमाल के बेअर मियां मक्खन उनके ख़ास माशूक़ थे, जिन पर उन्होंने कई शे’र लिखे।

मक्खन मियां ग़ज़ब हैं फ़क़ीरों के हाल पर आता है उनको जोश-ए-जमाली कमाल पर

आबरू को संगीत और नृत्य से भी बहुत लगाव था। वो शाही दरबार के मशहूर बीन नवाज़ सदारंग के ख़ास दोस्त थे। जब सदारंग कुछ वक़्त के लिए आगरा चले गए, तो आबरू ने उनके लिए एक शे’र कहा: भूलोगे तुम अगर जो सदा रंग जी हमें तो नांव बीन-बीन के तुमको धरेंगे हम

एक अजब शख़्सियत: दरवेशी और मज़ाक़

आबरू की ज़िंदगी के बारे में ज़्यादा जानकारी तो नहीं मिलती, लेकिन जो कुछ पता है, उससे उनकी एक अलग ही तस्वीर बनती है। वो एक आंख से माज़ूर थे, लंबी दाढ़ी रखते थे और हाथ में छड़ी लेकर चलते थे। अपनी आख़िरी उम्र में वो दरवेश और क़लंदर बन गए थे।

समकालीन शायरों से उनकी नोक-झोंक भी ख़ूब चलती थी। मज़हर जान-ए-जानां और बेनवा जैसे शायर अक्सर उनकी शायरी की बजाय उनकी एक आंख की ख़राबी को मज़ाक़ का निशाना बनाते थे।

दिलदार की गली में मुकर्रर गए हैं हम
हो आए हैं अभी तो फिर आ कर गए हैं हम

शाह मुबारक आबरू

आबरू की शख़्सियत उनके कलाम की तरह ही बेबाक और रंगीन थी। वो अच्छे लिबास और कीमती पोशाकों के शौक़ीन थे। गंज़िफ़ा (ताश का एक खेल) और कबूतरबाज़ी जैसे शौक़ भी रखते थे।

एक अनमोल विरासत

मुसहफ़ी के मुताबिक, आबरू ने सिर्फ़ 50 साल की उम्र पाई और 1733 ईस्वी में घोड़े की लात लगने से उनका इंतक़ाल हो गया। उनकी क़ब्र दिल्ली में सैयद हसन रसूल नुमा के पास है।

आबरू ने एक बहुत ही मुश्किल दौर में उर्दू शायरी को एक नया रास्ता दिखाया। उन्होंने अपनी शायरी से फ़ारसी के शिकंजे को तोड़ा और उर्दू को हिंदुस्तानी रंग दिया। वो ऐसे शायर थे जिन्होंने शायरी को सिर्फ़ दरबारों तक महदूद नहीं रखा, बल्कि उसे आम लोगों तक पहुंचाया। उनकी शायरी उस वक़्त के समाज का आईना है, जिसमें हर तरह का रंग दिखाई देता है।

यारो हमारा हाल सजन सीं बयां करो
ऐसी तरह करो कि उसे मेहरबां करो

शाह मुबारक आबरू

आबरू का योगदान सिर्फ़ एक दीवान लिखने तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने उर्दू शायरी की बुनियाद को मज़बूत किया। वो पहले ऐसे शायर थे, जिन्होंने हिंदी और ब्रज भाषा के शब्दों और अंदाज़ को बेझिझक उर्दू में शामिल किया, जिससे हमारी ज़बान और भी ज़्यादा ख़ूबसूरत और भरपूर हो गई।

ये भी पढ़ें: ख़लील-उर-रहमान आज़मी: जब एक हिंदुस्तानी शायर बना ब्रिटिश स्कॉलर का टीचर 

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